आज के समय में योग क्या है, यह न जानने वाले लोग बहुत कम हैं। योग अत्यंत लाभकारी है,यह बात लगभग सभी स्वाभाविक रूप से स्वीकार करते हैं। अनेक योग-गुरुओं ने योग पर पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें से कुछ बहुत लोकप्रिय भी हुई हैं।
लेकिन यदि थोड़ा गहराई से देखा जाए, तो इन पुस्तकों में से अधिकांश केवल उन्हीं विशेष ‘योग-रूपों’ की चर्चा करती हैं, जिनका प्रचार वे गुरु स्वयं करते हैं। साथ ही, इन पुस्तकों का बड़ा हिस्सा योग को आदेशात्मक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। योग को धर्म या अन्य आस्था-आधारित प्रणालियों की तरह एक विश्वास-प्रणाली के रूप में चित्रित कियाजाता है।
उदाहरण के लिए, जब ये पुस्तकें आसनों या श्वास-प्रश्वास के अभ्यासों की बात करती हैं, तो उनके स्वास्थ्य-लाभों का अवश्य उल्लेख करती हैं। लेकिन ये अभ्यास, बताए गए परिणाम कैसे उत्पन्न करते हैं, इसका तर्कसंगत विवरण बहुत कम मिलता है। अपने दावों के समर्थन में प्रयोगात्मक प्रमाण भी बहुत कम दिए जाते हैं।
कुछ गुरु, परस्पर विरोधी अनेक अवधारणाओं और दृष्टिकोणों को बिना किसी स्पष्ट विवरण के एक साथ प्रस्तुत कर देते हैं और पाठकों को अतिशयोक्ति में डुबोदेते हैं। वे cosmic energy, अतिचेतन, अतींद्रिय जागरूकता, जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं, लेकिन इनके वास्तविक अर्थ क्या हैं, यह बहुत कम ही स्पष्ट कियाजाता है या परिभाषित किया जाता है।
आधुनिक चिकित्सा शब्दावली या क्वांटम भौतिकी के सिद्धांतों से जुड़ी अस्पष्ट उपमाओं का उपयोग करके, ये गुरु अपने रहस्यमय सिद्धांतों को वैज्ञानिक आवरण देने का प्रयास करते हैं।
योग की इस प्रकार की व्याख्या से दो-प्रमुख समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। पहली, यदि योग के पीछे कार्य करने वाली मूल प्रक्रियाओं को स्पष्ट रूप से न समझाजाए, तो उसके संपूर्ण लाभ प्राप्त करना कठिन हो जाता है। दूसरी, जिसे ठीक से समझानगया हो, ऐसी कोई भी प्रणाली समय के साथ विकृत होजाती है और अपना महत्व खोदेती है।
हमें एक ऐसी योग-पद्धति की आवश्यकता है, जो स्पष्ट रूप से परिभाषित हो, जिसके सिद्धांत दृढ़ हों, और जिसे यथासंभव निष्पक्ष रूप से परीक्षण के लिए परखा जासके। ऐसी प्रणाली, जो भरोसेमंद और अपेक्षित परिणाम दे।
क्या
आज हम जो योग देख रहे हैं,
वह इन
मानदंडों को पूरा करता है?
अधिकांश
लोगों के लिए योग का अर्थ
शरीर-केंद्रित
अभ्यास, कुछ
आसन या श्वसन क्रियाएँ ही होता
है। ऐसे लोगों का उद्देश्य
प्रायः शारीरिक स्वास्थ्य
और शारीरिक क्षमता को बनाए
रखना होता है।
स्वास्थ्य
और शारीरिक क्षमता निस्संदेह
महत्वपूर्ण हैं, लेकिन
योग केवल वहीं तक सीमित नहीं
है।
योग
सामान्य स्वास्थ्य-वृद्धि
से लेकर तनाव-निवारण,
एकाग्रता-वृद्धि,
मानसिक
क्षमता का विकास, अवर्णनीय
आनंद का अनुभव, परम
साक्षात्कार, और
अंततः अधिक शांत तथा रहनेयोग्य
संसार के निर्माणतक,
अत्यंत
व्यापक उपयोग रखता है।
लेकिन
इनमें से कुछ योग के वास्तविक
लक्ष्य नहीं हैं। ये तो योग
का ईमानदारी से अभ्यास करने
पर स्वाभाविक रूप से प्राप्त
होने वाले उपफल मात्र हैं।
इसे हम आगे देखेंगे।
योग का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। समय के साथ योग में अनेक परिवर्तन हुए और उसने कई नए रूप धारण किए। आज के समय में जिसे योग के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, वह विराट-योग का केवल एक संक्षिप्त रूप मात्र है।
तो फिर वास्तव मॆं योग क्या है?
योग के मूल प्रवर्तक के रूप में व्यापक रूप से स्वीकार किए गए पतंजलि योग को इस प्रकार परिभाषित करते हैं:
“योगः,
चित्तवृत्ति
निरोधः"
योग
का अर्थ है मन की क्रियाओं को
नियंत्रित करना।
–
योगसूत्र
1.2
अर्थात योग मन को पूर्णतः शांत अवस्था में लाने से संबंधित है। लेकिन शांत मन होना ही योग का अंतिम लक्ष्य नहीं है। मन को शांत करना केवल एक विधि है,मन से परे किसी अवस्था तक पहुँचने का साधन। वह अवस्था क्या है, इसे हम आगे देखेंगे।
पतंजलि के योगसूत्र के इसी दूसरे सूत्र से स्पष्ट होता है कि योग मुख्यतः मन-केंद्रित पद्धति है। आज हम जिसे योग के रूप में देखते हैं, उसके अनेक अंग, इसमें बहुत कम मात्रा में पाए जाते हैं।
आइए, पतंजलि द्वारा प्रतिपादित इस मूल योग में थोड़ा और प्रवेश करें।
पतंजलि
का योग उसके ‘योगसूत्र’ नामक
ग्रंथ में वर्णित है। यह कुल
195 सूत्रों
का संग्रह है। ‘सूत्र’ का अर्थ
है,कम
शब्दों में गहन अर्थ को समेटे
हुए संक्षिप्त अभिव्यक्ति।
ये
सूत्र चार अध्यायों में विभाजित
हैं,समाधि
पाद, साधन
पाद, विभूति
पाद और कैवल्य पाद।
इन
अध्यायों के बीच की सीमाएँ
बहुत स्पष्ट नहीं हैं। विषय
कई बार अध्यायों की सीमाओं
को पार करतेहुए प्रवाहित होते
हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि
मूलतः यह एक सतत ग्रंथ था,
जिसे बाद
में किसी ने विभाजित किया।
पहले दो अध्यायों में योगसूत्र के केंद्रीय तत्व सम्मिलित हैं। वे मूल सिद्धांतों और विधियों की चर्चा करते हैं। शेष अध्याय, बाद की जोड़ प्रतीत होते हैं. इसलिए मैं सामान्यतः इन्हीं पहले दो अध्यायों पर अधिक ध्यान केंद्रित करता हूँ।
अधिकांश लोगों की मान्यता है कि पतंजलि का योग ईसा-पूर्व 200 के आसपास प्रचलन में आया। कुछ लोग इसे बाद की अवधि,ईसा की चौथी से छठी शताब्दी,से जोड़ते हैं। लेकिन आगे जिन कारणों का मैं उल्लेख करूँगा, उनके आधार पर मेरी धारणा है कि पतंजलि ईसा-पूर्व 200 या उससे भी पहले के समय का व्यक्ति था।
इन तिथियों को लेकर मैं अधिक आग्रह नहीं करता। किंतु कभी-कभी कालक्रम यह समझने में सहायता करता है कि विचार एक चरण से दूसरे चरणतक कैसे पहुँचे। आज का योग अपने वर्तमान स्वरूप में कैसे आया, और इसके लिए कौन-से तत्व उत्तरदायी रहे,इसे समझने में यह उपयोगी होता है।
पतंजलि
के योग का मुख्य विषय मन को
क्रमशः पूर्ण शांति की अवस्था
तक पहुँचाना है। इसका उद्देश्य
हमारे व्यक्तिगत अस्तित्व
के परमसत्य को जानना है।
उस
लक्ष्य तक पहुँचने के मार्ग
के रूप में ध्यान को बताया गया
है। इस योग में शारीरिक आसनों
और श्वसन अभ्यासों का उल्लेख
बहुत सीमित है। उन्हें केवल
ध्यान की पूर्वतैयारी के रूप
में देखा गया है। स्वास्थ्य-वृद्धि
कभी भी लक्ष्य नहीं रही।
पतंजलि के योग में आठ चरण हैं, जिन्हें अष्टांग-योग कहा जाता है। संक्षेप में ये हैं,यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
पूरी किताब सुनने के लिए, कृपया “https://tinyurl.com/mylibrary1234” देखें

No comments:
Post a Comment