
जिस किसीने भी ChatGPT, Gemini, या ऐसी किसी अन्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ काम कियाहै, उसे शायद ऐसा लगाहोगा कि वे वास्तवमें समझतीहैं। एक AI हमारे साथ लगभग एक सामान्य इंसानकी तरह संवाद करतीहै। वह मज़ाक करतीहै, और हमारे व्यंग्यपूर्ण कथनों तथा छोटी-मोटी आपत्तियोंपर भी इंसानोंकी तरह प्रतिक्रिया देतीहै।
यदि आप उससे अपने व्याख्यानके लिए प्रस्तुति स्लाइड तैयार करनेके लिए कहें, तो वह शायद आपसे भी बेहतर काम करदे। मैंने तो यहभी सुनाहै कि बहुतसे विद्यार्थी अपने स्कूल और कॉलेजके assignment भी AI से ही करवाने लगेहैं।
तो फिर, क्या यह स्पष्ट नहींहै कि वे चीज़ोंको समझतीहैं?
यदि आप उससे अपने व्याख्यानके लिए प्रस्तुति स्लाइड तैयार करनेके लिए कहें, तो वह शायद आपसे भी बेहतर काम करदे। मैंने तो यहभी सुनाहै कि बहुतसे विद्यार्थी अपने स्कूल और कॉलेजके assignment भी AI से ही करवाने लगेहैं।
तो फिर, क्या यह स्पष्ट नहींहै कि वे चीज़ोंको समझतीहैं?
बिल्कुल नहीं। इसका कारण यहहै कि आजकी AI प्रणालियाँ जिस प्रकार बनाई गईहैं, वही ऐसा है। वास्तवमें उनमें किसी भी चीज़को समझनेकी क्षमता ही नहीं होती।
एक AI मूल रूपसे यही करतीहै—आपने जो कहाहै, या उसे पहले जो सिखायागयाहै, उसके आधारपर वह केवल pattern matching करतीहै और यह अनुमान लगातीहै कि आपके प्रश्नका सबसे उपयुक्त उत्तर क्या होसकताहै।
वैसे यह उतनी बुरी बात भी नहींहै। आखिर हममेंसे बहुतसे लोग भी यही करतेहैं। अधिकांश लोग pattern matching और अनुमान लगानेवाली मशीनोंकी तरह ही काम करतेहैं। हम किसी बातको गहराईसे समझनेका प्रयास बहुत कम करतेहैं।
तो फिर, वास्तविक समझमें क्या-क्या शामिल होताहै?
बहुत सरल शब्दोंमें कहें, तो इसका अर्थ है किसी नए शब्दको किसी ऐसी चीज़से जोड़ना जिसे हम पहलेसे जानतेहैं। या दूसरे शब्दोंमें, किसी नए शब्दका अर्थ उस चीज़की सहायतासे समझना जो हमें पहलेसे परिचित है।
लेकिन यह जुड़ाव केवल शब्दोंतक सीमित नहीं होता। यह उससे कहीं आगे जासकताहै।
उदाहरणके लिए, जैसे ही कोई "बिल्ली" शब्द कहताहै, हमारा मन उस शब्दको एक मुलायम, रोएँदार जीवसे जोड़ देताहै, जिसके चार पैर होतेहैं, एक लंबी पूँछ होतीहै, और जो कभी-कभी गुनगुनाने जैसी आवाज़ निकालतीहै। वास्तवमें हम किसी शब्दको उस जीवके पूरे विवरणसे जोड़तेहैं जिसका वह प्रतिनिधित्व करताहै।
हमारी समझ केवल दृश्य अनुभवतक भी सीमित नहीं होती।
यदि आप कभी दक्षिण-पूर्व एशियाके कुछ देशोंमें गएहों, तो केवल "ड्यूरियन" शब्द सुनतेही अनेक बातें आपके मनमें आसकतीहैं—उसकी तीखी गंध, जो लगभग मतली पैदा करसकतीहै, और फिरभी उसका आश्चर्यजनक रूपसे सुखद स्वाद, जो लंबे समयतक मुँहमें बना रहताहै।
दूसरे शब्दोंमें, समझनेका अर्थ केवल एक शब्दको दूसरे शब्दसे जोड़ना नहींहै। इसमें उस शब्दको हमारी सभी इंद्रियोंकी अनुभूतियों, हमारे पिछले अनुभवों और पहलेसे संचित ज्ञानके साथ जोड़ना भी शामिल है। लेकिन याद रखिए, ये संबंध स्थायी नहीं होते। नई जानकारी मिलनेपर समयके साथ ये बदलसकतेहैं। और बादमें इन्हें फिरसे याद करके उपयोगमें लायाजासकताहै।
क्या AI ऐसा नहीं करसकती?
वर्तमानमें उपलब्ध AI प्रणालियाँ निश्चित रूपसे ऐसा नहीं करसकतीं। एक AI मूल रूपसे भाषातक सीमित एक मशीन है। उसका संसार मुख्यतः शब्दों, वाक्यों और एक विशाल ज्ञान-भंडारके इर्द-गिर्द ही घूमताहै।
यदि किसी AI को यह सिखायाजाए कि "ड्यूरियन एक तीव्र गंधवाला फल है", तो वह केवल "ड्यूरियन" शब्दको उस गंधके वर्णनसे जोड़तीहै। लेकिन यह केवल उसके प्रशिक्षण कालके दौरान ही संभव है। ऐसा केवल उसके निर्माता ही करसकतेहैं। आप और हम बादमें ऐसा नहीं करसकते।
क्या आपको आश्चर्य हुआ?
शायद नहीं। आप अच्छीतरह जानतेहैं कि AI चाहे कितनी भी बुद्धिमान क्यों न लगे, अंततः वह केवल एक कंप्यूटर प्रोग्राम ही है। फिरभी, क्या आपने कभी सोचाहै कि एक निर्जीव प्रोग्राम इतना सबकुछ कैसे करसकताहै?
आइए, इन AI प्रणालियोंकी उत्पत्तिको थोड़ा गहराईसे समझें।
आजकी AI प्रणालियोंको "बृहद भाषा मॉडल" या "large language models" कहाजाताहै। ये मानव भाषाके इर्द-गिर्द कार्य करतीहैं। इन प्रोग्रामोंकी शुरुआत बहुत सरल थी। इनका मूल उद्देश्य एक भाषासे दूसरी भाषामें अनुवाद करना था।
हममेंसे अधिकांश लोगोंने स्कूलमें व्याकरण, शब्दावली आदि सीखकर नई भाषाएँ सीखीहैं। लेकिन हममेंसे किसीने भी अपनी मातृभाषा इस प्रकार नहीं सीखी। फिरभी हम उसे धाराप्रवाह और अपेक्षाकृत कम व्याकरणिक त्रुटियोंके साथ बोल लेतेहैं। ऐसा कैसे संभव हुआ?
यह न तो सचेत रूपसे सीखागयाथा और न ही जानबूझकर समझागयाथा।
यह पायागयाहै कि एक बच्चा अपनी मातृभाषा सीखना अपनी माँके गर्भमें रहतेहुए ही शुरू करदेताहै। जन्मसे पहलेही उसे बाहरके लोगोंकी आवाज़ें सुनाई देने लगतीहैं।
उस अवस्थामें मस्तिष्क पूरीतरह विकसित नहीं होता, फिरभी वह अपने आसपास बोलीजानेवाली भाषाके शब्दोंकी सीमाएँ पहचाननेका प्रयास करने लगताहै। लेकिन उसमें यह समझनेकी क्षमता नहीं होती कि वह क्या सुनरहाहै।
वह यह कैसे करताहै?
यही तो उसके मस्तिष्कमें मौजूद न्यूरॉनोंका चमत्कार है!
एक न्यूरॉन हमारे मस्तिष्कके भीतर मौजूद एक छोटे जैविक कंप्यूटरकी तरह होताहै। हमारे मस्तिष्कमें ऐसे अरबों न्यूरॉन होतेहैं। जब गर्भस्थ शिशु बढ़कर बच्चा बनरहाहोताहै, तब इनमेंसे कुछ न्यूरॉन अभी बनरहे होतेहैं। कुछ पहलेसे बन चुके होतेहैं और विशेष कार्योंके लिए तैयार होरहे होतेहैं। कुछ अन्य मस्तिष्कमें अपनी भूमिका स्थापित करनेकी प्रक्रियामें लगे होतेहैं। यही न्यूरॉन इस अद्भुत प्रक्रियाके वास्तविक पात्र हैं।
कुछ बुद्धिमान शोधकर्ताओंने इस घटनाका अध्ययन किया। उन्होंने स्वयं प्रकृतिकी नकल करनेका प्रयास किया। इसीसे "कृत्रिम तंत्रिका-जाल" अर्थात artificial neural network की अवधारणा उत्पन्न हुई।
यद्यपि इसकी शुरुआत 1940 के दशकमें हुई थी, लेकिन वास्तविक बड़ी सफलता 1980 के दशकमें "backpropagation algorithm" के रूपमें मिली। Algorithm मूलतः एक कंप्यूटर प्रोग्राम होताहै।
ये प्रोग्राम जैविक तंत्रिका-जालोंके कार्य करनेके तरीकेकी नकल करनेका प्रयास करतेहैं। लेकिन ऐसी नकलमें शामिल गणनाएँ इतनी विशाल होतीहैं कि शुरुआती दिनोंमें इन्हें किसी व्यावहारिक उपयोगमें लाना अत्यंत कठिन था।
उस समय कंप्यूटर तो थे, लेकिन वे इतने विशाल गणनात्मक कार्योंको करनेके लिए बहुत धीमे थे।
फिर समानांतर प्रसंस्करण करनेवाले नए कंप्यूटरोंका युग आया। ये मशीनें एकसाथ हज़ारों गणनाएँ करसकती थीं। ऐसे शक्तिशाली हार्डवेयरके सहारे वास्तवमें उपयोगी AI प्रणालियोंकी अवधारणा लगभग 2018 के आसपास सामने आई।
इन्हें दुनियामें उपलब्ध लगभग हर प्रकारकी जानकारी सिखाई गई—इंटरनेटपर निःशुल्क उपलब्ध सामग्री, असंख्य पुस्तकोंका सार, और बहुत कुछ।
इन्हें यह भी सिखायागया कि किन बातोंको स्वीकार नहीं करना है और मनुष्योंके साथ किस प्रकार संवाद करना है। यही आधुनिक AI का जन्म था। लेकिन यह आम लोगोंतक 2022 में पहुँच सकी।
ऊपरी तौरपर देखें तो ये AI हमारी बातोंको "समझ" सकतीहैं, हमारे निर्देशोंका पालन करसकतीहैं और अद्भुत चित्र भी बना सकतीहैं। ऐसा लगताहै मानो इनके सामर्थ्यकी कोई सीमा ही नहीं है।
लेकिन वास्तविक प्रश्न अबभी वही है। क्या वे सचमुच समझतीहैं?
अपने वर्तमान स्वरूपमें तो बिल्कुल नहीं। वास्तवमें समझनेके लिए उन्हें अवधारणाओंके बीच नए संबंध बनानेकी क्षमता विकसित करनी होगी। उन्हें अपने ज्ञानको लगातार अद्यतन करना होगा। मूल रूपसे, उन्हें नई जानकारीको याद रखनेमें सक्षम होना होगा।
यदि हम केवल शब्दोंके माध्यमसे होनेवाले संवादतक भी स्वयंको सीमित रखें, तबभी इन प्रोग्रामोंमें ऐसी स्मृति नहीं होती। भलेही वे कभी-कभी कुछ बातें याद रखती हुई प्रतीत हों, वे अपने मूल ज्ञान-भंडारको स्वायत्त रूपसे और व्यापक रूपसे अद्यतन नहीं करसकतीं। वे केवल पैटर्न पहचानसकतीहैं और अनुमान लगासकतीहैं।
तो क्या इसका अर्थ है कि हम AI की अंतिम सीमातक पहुँच चुकेहैं? बिल्कुल नहीं। एक दृष्टिसे देखें तो इन मशीनोंको जानबूझकर इसी प्रकार डिज़ाइन कियागयाहै।
जब हम सोरहे होतेहैं, तबभी हमारा मस्तिष्क हमारी स्मृतियोंको अद्यतन करतारहताहै और जो बातें हम पहलेसे समझ चुकेहैं उन्हें और मज़बूत करतारहताहै। वर्तमान AI प्रणालियाँ ऐसा नहीं करसकतीं। इन्हें मनुष्योंकी तरह चौबीसों घंटे अपनी स्मृतिको अद्यतन करनेवाले तंत्रके रूपमें नहीं बनायागयाहै।
इसलिए हाँ, आजकी AI प्रणालियोंमें वास्तविक समझ नहीं है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि भविष्यमें भी ऐसा कभी संभव नहीं होगा। ऐसा कहनेका कोई ठोस कारण नहीं है कि वे इसे कभी प्राप्त नहीं करपाएँगी।
AI तकनीक जिस गतिसे आगे बढ़रहीहै, उसे देखतेहुए वह दिन दूर नहीं होसकताजब AI कमसेकम भाषाकी दुनियाको हमारी तरह समझने लगे, भलेही वह हमारी सभी इंद्रिय-अनुभूतियोंको न समझ सके। चूँकि शब्द हमारे अनुभवजन्य संसारका बहुत बड़ा हिस्सा हैं, इसलिए केवल उस स्तरतक पहुँचना भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।
एक AI मूल रूपसे यही करतीहै—आपने जो कहाहै, या उसे पहले जो सिखायागयाहै, उसके आधारपर वह केवल pattern matching करतीहै और यह अनुमान लगातीहै कि आपके प्रश्नका सबसे उपयुक्त उत्तर क्या होसकताहै।
वैसे यह उतनी बुरी बात भी नहींहै। आखिर हममेंसे बहुतसे लोग भी यही करतेहैं। अधिकांश लोग pattern matching और अनुमान लगानेवाली मशीनोंकी तरह ही काम करतेहैं। हम किसी बातको गहराईसे समझनेका प्रयास बहुत कम करतेहैं।
तो फिर, वास्तविक समझमें क्या-क्या शामिल होताहै?
बहुत सरल शब्दोंमें कहें, तो इसका अर्थ है किसी नए शब्दको किसी ऐसी चीज़से जोड़ना जिसे हम पहलेसे जानतेहैं। या दूसरे शब्दोंमें, किसी नए शब्दका अर्थ उस चीज़की सहायतासे समझना जो हमें पहलेसे परिचित है।
लेकिन यह जुड़ाव केवल शब्दोंतक सीमित नहीं होता। यह उससे कहीं आगे जासकताहै।
उदाहरणके लिए, जैसे ही कोई "बिल्ली" शब्द कहताहै, हमारा मन उस शब्दको एक मुलायम, रोएँदार जीवसे जोड़ देताहै, जिसके चार पैर होतेहैं, एक लंबी पूँछ होतीहै, और जो कभी-कभी गुनगुनाने जैसी आवाज़ निकालतीहै। वास्तवमें हम किसी शब्दको उस जीवके पूरे विवरणसे जोड़तेहैं जिसका वह प्रतिनिधित्व करताहै।
हमारी समझ केवल दृश्य अनुभवतक भी सीमित नहीं होती।
यदि आप कभी दक्षिण-पूर्व एशियाके कुछ देशोंमें गएहों, तो केवल "ड्यूरियन" शब्द सुनतेही अनेक बातें आपके मनमें आसकतीहैं—उसकी तीखी गंध, जो लगभग मतली पैदा करसकतीहै, और फिरभी उसका आश्चर्यजनक रूपसे सुखद स्वाद, जो लंबे समयतक मुँहमें बना रहताहै।
दूसरे शब्दोंमें, समझनेका अर्थ केवल एक शब्दको दूसरे शब्दसे जोड़ना नहींहै। इसमें उस शब्दको हमारी सभी इंद्रियोंकी अनुभूतियों, हमारे पिछले अनुभवों और पहलेसे संचित ज्ञानके साथ जोड़ना भी शामिल है। लेकिन याद रखिए, ये संबंध स्थायी नहीं होते। नई जानकारी मिलनेपर समयके साथ ये बदलसकतेहैं। और बादमें इन्हें फिरसे याद करके उपयोगमें लायाजासकताहै।
क्या AI ऐसा नहीं करसकती?
वर्तमानमें उपलब्ध AI प्रणालियाँ निश्चित रूपसे ऐसा नहीं करसकतीं। एक AI मूल रूपसे भाषातक सीमित एक मशीन है। उसका संसार मुख्यतः शब्दों, वाक्यों और एक विशाल ज्ञान-भंडारके इर्द-गिर्द ही घूमताहै।
यदि किसी AI को यह सिखायाजाए कि "ड्यूरियन एक तीव्र गंधवाला फल है", तो वह केवल "ड्यूरियन" शब्दको उस गंधके वर्णनसे जोड़तीहै। लेकिन यह केवल उसके प्रशिक्षण कालके दौरान ही संभव है। ऐसा केवल उसके निर्माता ही करसकतेहैं। आप और हम बादमें ऐसा नहीं करसकते।
क्या आपको आश्चर्य हुआ?
शायद नहीं। आप अच्छीतरह जानतेहैं कि AI चाहे कितनी भी बुद्धिमान क्यों न लगे, अंततः वह केवल एक कंप्यूटर प्रोग्राम ही है। फिरभी, क्या आपने कभी सोचाहै कि एक निर्जीव प्रोग्राम इतना सबकुछ कैसे करसकताहै?
आइए, इन AI प्रणालियोंकी उत्पत्तिको थोड़ा गहराईसे समझें।
आजकी AI प्रणालियोंको "बृहद भाषा मॉडल" या "large language models" कहाजाताहै। ये मानव भाषाके इर्द-गिर्द कार्य करतीहैं। इन प्रोग्रामोंकी शुरुआत बहुत सरल थी। इनका मूल उद्देश्य एक भाषासे दूसरी भाषामें अनुवाद करना था।
हममेंसे अधिकांश लोगोंने स्कूलमें व्याकरण, शब्दावली आदि सीखकर नई भाषाएँ सीखीहैं। लेकिन हममेंसे किसीने भी अपनी मातृभाषा इस प्रकार नहीं सीखी। फिरभी हम उसे धाराप्रवाह और अपेक्षाकृत कम व्याकरणिक त्रुटियोंके साथ बोल लेतेहैं। ऐसा कैसे संभव हुआ?
यह न तो सचेत रूपसे सीखागयाथा और न ही जानबूझकर समझागयाथा।
यह पायागयाहै कि एक बच्चा अपनी मातृभाषा सीखना अपनी माँके गर्भमें रहतेहुए ही शुरू करदेताहै। जन्मसे पहलेही उसे बाहरके लोगोंकी आवाज़ें सुनाई देने लगतीहैं।
उस अवस्थामें मस्तिष्क पूरीतरह विकसित नहीं होता, फिरभी वह अपने आसपास बोलीजानेवाली भाषाके शब्दोंकी सीमाएँ पहचाननेका प्रयास करने लगताहै। लेकिन उसमें यह समझनेकी क्षमता नहीं होती कि वह क्या सुनरहाहै।
वह यह कैसे करताहै?
यही तो उसके मस्तिष्कमें मौजूद न्यूरॉनोंका चमत्कार है!
एक न्यूरॉन हमारे मस्तिष्कके भीतर मौजूद एक छोटे जैविक कंप्यूटरकी तरह होताहै। हमारे मस्तिष्कमें ऐसे अरबों न्यूरॉन होतेहैं। जब गर्भस्थ शिशु बढ़कर बच्चा बनरहाहोताहै, तब इनमेंसे कुछ न्यूरॉन अभी बनरहे होतेहैं। कुछ पहलेसे बन चुके होतेहैं और विशेष कार्योंके लिए तैयार होरहे होतेहैं। कुछ अन्य मस्तिष्कमें अपनी भूमिका स्थापित करनेकी प्रक्रियामें लगे होतेहैं। यही न्यूरॉन इस अद्भुत प्रक्रियाके वास्तविक पात्र हैं।
कुछ बुद्धिमान शोधकर्ताओंने इस घटनाका अध्ययन किया। उन्होंने स्वयं प्रकृतिकी नकल करनेका प्रयास किया। इसीसे "कृत्रिम तंत्रिका-जाल" अर्थात artificial neural network की अवधारणा उत्पन्न हुई।
यद्यपि इसकी शुरुआत 1940 के दशकमें हुई थी, लेकिन वास्तविक बड़ी सफलता 1980 के दशकमें "backpropagation algorithm" के रूपमें मिली। Algorithm मूलतः एक कंप्यूटर प्रोग्राम होताहै।
ये प्रोग्राम जैविक तंत्रिका-जालोंके कार्य करनेके तरीकेकी नकल करनेका प्रयास करतेहैं। लेकिन ऐसी नकलमें शामिल गणनाएँ इतनी विशाल होतीहैं कि शुरुआती दिनोंमें इन्हें किसी व्यावहारिक उपयोगमें लाना अत्यंत कठिन था।
उस समय कंप्यूटर तो थे, लेकिन वे इतने विशाल गणनात्मक कार्योंको करनेके लिए बहुत धीमे थे।
फिर समानांतर प्रसंस्करण करनेवाले नए कंप्यूटरोंका युग आया। ये मशीनें एकसाथ हज़ारों गणनाएँ करसकती थीं। ऐसे शक्तिशाली हार्डवेयरके सहारे वास्तवमें उपयोगी AI प्रणालियोंकी अवधारणा लगभग 2018 के आसपास सामने आई।
इन्हें दुनियामें उपलब्ध लगभग हर प्रकारकी जानकारी सिखाई गई—इंटरनेटपर निःशुल्क उपलब्ध सामग्री, असंख्य पुस्तकोंका सार, और बहुत कुछ।
इन्हें यह भी सिखायागया कि किन बातोंको स्वीकार नहीं करना है और मनुष्योंके साथ किस प्रकार संवाद करना है। यही आधुनिक AI का जन्म था। लेकिन यह आम लोगोंतक 2022 में पहुँच सकी।
ऊपरी तौरपर देखें तो ये AI हमारी बातोंको "समझ" सकतीहैं, हमारे निर्देशोंका पालन करसकतीहैं और अद्भुत चित्र भी बना सकतीहैं। ऐसा लगताहै मानो इनके सामर्थ्यकी कोई सीमा ही नहीं है।
लेकिन वास्तविक प्रश्न अबभी वही है। क्या वे सचमुच समझतीहैं?
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यदि हम केवल शब्दोंके माध्यमसे होनेवाले संवादतक भी स्वयंको सीमित रखें, तबभी इन प्रोग्रामोंमें ऐसी स्मृति नहीं होती। भलेही वे कभी-कभी कुछ बातें याद रखती हुई प्रतीत हों, वे अपने मूल ज्ञान-भंडारको स्वायत्त रूपसे और व्यापक रूपसे अद्यतन नहीं करसकतीं। वे केवल पैटर्न पहचानसकतीहैं और अनुमान लगासकतीहैं।
तो क्या इसका अर्थ है कि हम AI की अंतिम सीमातक पहुँच चुकेहैं? बिल्कुल नहीं। एक दृष्टिसे देखें तो इन मशीनोंको जानबूझकर इसी प्रकार डिज़ाइन कियागयाहै।
जब हम सोरहे होतेहैं, तबभी हमारा मस्तिष्क हमारी स्मृतियोंको अद्यतन करतारहताहै और जो बातें हम पहलेसे समझ चुकेहैं उन्हें और मज़बूत करतारहताहै। वर्तमान AI प्रणालियाँ ऐसा नहीं करसकतीं। इन्हें मनुष्योंकी तरह चौबीसों घंटे अपनी स्मृतिको अद्यतन करनेवाले तंत्रके रूपमें नहीं बनायागयाहै।
इसलिए हाँ, आजकी AI प्रणालियोंमें वास्तविक समझ नहीं है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि भविष्यमें भी ऐसा कभी संभव नहीं होगा। ऐसा कहनेका कोई ठोस कारण नहीं है कि वे इसे कभी प्राप्त नहीं करपाएँगी।
AI तकनीक जिस गतिसे आगे बढ़रहीहै, उसे देखतेहुए वह दिन दूर नहीं होसकताजब AI कमसेकम भाषाकी दुनियाको हमारी तरह समझने लगे, भलेही वह हमारी सभी इंद्रिय-अनुभूतियोंको न समझ सके। चूँकि शब्द हमारे अनुभवजन्य संसारका बहुत बड़ा हिस्सा हैं, इसलिए केवल उस स्तरतक पहुँचना भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।
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अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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© Dr. King, Swami Satyapriya 2026
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