अपने एक संवाद में, Sam Harris बताते हैं कि जब उनकी मुलाकात भारतीय गुरु Poonjaji से हुई, तो उन्हें एक बहुत ही रोचक अनुभव हुआ। वे कहते हैं कि यह अनुभव उन कई ध्यान शिविरों से भी कहीं गहरा था, जिनमें उन्होंने महीनों तक भाग लिया था।
वैसे, Sam Harris एक अमेरिकी न्यूरोसाइंटिस्ट हैं जो बाद में ध्यान शिक्षक बन गए। उन्होंने भारत में कई वर्षों तक ध्यान का अध्ययन किया। वे एक अत्यंत तर्कशील व्यक्ति हैं, और उनकी मुख्य रुचि यह समझने में थी कि ध्यान कैसे MDMA जैसी नशीलीदवाओं से मिलनेवाले अनुभवों जैसा प्रभाव पैदा करसकता है।
Poonjaji की शिक्षाओं ने Sam को ज्यादा प्रभावित नहीं किया। लेकिन एक और बात ने उन्हें उलझन में डाल दिया। केवल Poonjaji की उपस्थिति, वह भी थोड़े समय केलिए, उन्हें इतनी गहरी अनुभूतितक कैसे ले गई?
वैसे, Sam Harris एक अमेरिकी न्यूरोसाइंटिस्ट हैं जो बाद में ध्यान शिक्षक बन गए। उन्होंने भारत में कई वर्षों तक ध्यान का अध्ययन किया। वे एक अत्यंत तर्कशील व्यक्ति हैं, और उनकी मुख्य रुचि यह समझने में थी कि ध्यान कैसे MDMA जैसी नशीलीदवाओं से मिलनेवाले अनुभवों जैसा प्रभाव पैदा करसकता है।
Poonjaji की शिक्षाओं ने Sam को ज्यादा प्रभावित नहीं किया। लेकिन एक और बात ने उन्हें उलझन में डाल दिया। केवल Poonjaji की उपस्थिति, वह भी थोड़े समय केलिए, उन्हें इतनी गहरी अनुभूतितक कैसे ले गई?
Poonjaji अपने कम बोलने केलिए जाने जातेथे, मानो वे कुछ सिखाने से लगभग इंकार ही करते हों। तो फिर इतनी गहरी अनुभूति कैसे हुई,—बिना किसी शारीरिक या मौखिक माध्यम के?
यही बात Sam को परेशान कररही थी। उनके तर्कसंगत मन के पास इसका कोई उत्तर नहीं था।
क्या मन बिना किसी सीधे माध्यम के संवाद करसकता है? और क्या ऐसा संवाद इतना गहरा, इतना परिवर्तित करने वाला, और फिर भी इतना स्पष्ट हो सकता है?
Sam केलिए यह एक ऐसा रहस्य बना रहा जिसे वे अपने पूरे न्यूरोसाइंस ज्ञान के बावजूद कभी सुलझा नहीं पाए।
लेकिन हाँ, ऐसा लगता है कि कुछ अवस्थाओं में मन में ऐसी क्षमताएँ होती हैं। यह बिना शब्दों के भी संवाद करसकता है—सिर्फ मनुष्यों के साथ ही नहीं, बल्कि जानवरों और अन्य जीवों के साथ भी।
मैंने कुत्तों को, और यहाँ तक कि ज़हरीले साँपों को भी, एक विशेष मानसिक अवस्था में पास जाने पर पूरी तरह शांत होते देखा है।
अगर यह सच है, तो क्या केवल मानसिक शक्ति से किसी आक्रामक व्यक्ति को पूरी तरह बदलना संभव है? ऐसा होसके तो सभी संघर्ष और युद्ध समाप्त हो जाएँ।
1970 और 80 के दशक में, प्रसिद्ध भारतीय गुरु Mahesh Yogi-ने ऐसा ही दावा किया था। उन्होंने कहा कि वे ध्यान करने वालों के एक समूह को युद्धक्षेत्र में भेजकर, भीषण युद्धों को रोक सकते हैं। वे लोग चुपचाप ध्यान करेंगे—और विरोधी अपनी आक्रामकता छोड़देगा।
काश यह सच होता। इससे बहुत सी जानें और पीड़ा बच सकती थी।
लेकिन क्या वास्तव में ऐसा होता है? क्या कोई मन,—चाहे वह किसी भी अवस्था में हो—दूसरे मन को इस तरह प्रभावित करसकता है कि वह अपनी आक्रामक प्रवृत्तियाँ छोड़दे?
Maharshi और उनके अनुयायियों ने इसकेलिए 'ठोस' सिद्धांत प्रस्तुत किए। इस विषय पर उनके पास कुछ शोध-पत्र भी थे। लेकिन अधिकांश लोगों ने इसे केवल प्रचार का तरीका मानकर खारिज करदिया।
व्यक्तिगत रूप से, मैं मानता हूँ कि मन में ऐसी क्षमता हो सकती है। लेकिन क्या यह हमेशा काम करती है?
इतिहास को देखें तो, नहीं।
Buddh, जिनका मन इतना शक्तिशाली था, उन्होंने Ajathashatru जैसे अत्याचारी को भी एक ही बैठक में बदल दिया। फिर भी, वे अपने ही अनुयायियों के बीच चल रहे अंतहीन विवादों को नहीं रोक सके।
इतने दयालु और प्रेमपूर्ण Jesus Christ को भी यातनाएँ दी गईं और सूली पर चढ़ाया गया। उनके मानसिक बल का उनके अत्याचारियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
सर्वशक्तिमान Krishna भी Mahabharat युद्ध के बाद हुए भयानक नरसंहार को नहीं रोक सके।
जैसा कि मेरे एक मित्र ने मज़ाक में कहा था, एक शक्तिशाली रेडियो स्टेशन होने से कोई फायदा नहीं, अगर रेडियो चालू ही न हो, और सही तरंग पर ट्यून भी न हो। सुननेकेलिए सामने वाला ग्रहणशील होना चाहिए।
इसलिए, केवल मानसिक शक्ति से आक्रामकता को कम करना मात्र एक कल्पना है।
यह एक जिज्ञासु Sam को प्रभावित करसकता है, लेकिन उस आक्रामक व्यक्ति को नहीं, जिसकी सोच बंद है।
इसलिए मैं ध्यान को चल रहे युद्ध का समाधान नहीं बता रहा। लेकिन हाँ, यह भविष्य में ऐसे हालात बनने से रोकने का एक साधन हो सकता है।
ध्यान में अशांत मन को शांत करने की क्षमता होती है। एक शांत मन आसानी से भड़काने वाली बातों का शिकार नहीं होता। यह भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करसकता है, और तर्क केलिए जगह देता है।
इसलिए, मैं ध्यान को युद्धों से बचने केलिए एक संभावित रोकथाम के उपाय के रूप में सुझाता हूँ—एक प्रकार की पूर्व-रक्षा के रूप में, न कि बाद में व्यर्थ आग बुझाने के प्रयास के रूप में।
हमें अपने बच्चोंको उनके पालन-पोषण का हिस्सा बनाकर ध्यान की शिक्षा देनी चाहिए। इससे पूरी तरह संघर्ष-रहित दुनिया तो नहीं बनेगी, और न ही यह किसी आक्रामक व्यक्ति को बदल देगा। लेकिन यह आक्रामक व्यवहार की संभावना को निश्चित रूप से कम करेगा।
लेकिन हमें उन्हें कौन-सी ध्यान विधि सिखानी चाहिए?
आजकल बहुतसे गुरु हैं, और हरएक की अपनी अलग ध्यान तकनीक है।
जितने गुरु, उतनी विधियाँ।
कौन-सी सबसे अच्छी है?
यह पूछना, जैसा है कि, खाने का सबसे अच्छा तरीका कौन-सा है?
एक जापानी या चीनी व्यक्ति, चॉपस्टिक्स का उपयोग करता है। एक यूरोपीय, चाकू और कांटे का उपयोग करता है। एक भारतीय, अपने हाथोंसे खाना पसंद करता है।
इसी तरह, जब तक ध्यान, आपको एक शांत मन की ओर ले जाता है, वह ठीक है। जोभी आपको किसी भ्रमात्मक रास्ते पर लेजाए, उससे बचना चाहिए।
क्या इन में से कोई विधि, आपको उस सार्वभौमिक मन की अवस्था तक लेजाती है, जिसके बारे में मैंने कुछ पिछले एपिसोड में बात की थी? या ऐसे मन तक, जो दूसरोंको प्रभावित कर सके?
यह एक अलग विषय है। शायद, मैं इस पर किसीऔर समय बात करूँगा।
लेकिन कोई भी ध्यान अभ्यास, निश्चित रूप से संघर्ष की संभावना को कम करेगा,—और यही हमारी मुख्य चर्चा का विषय है।
तो आइए, याद रखें—
ये त्वरित समाधान नहीं हैं।
ये रातों-रात संघर्ष खत्म नहीं करेंगे।
लेकिन ये एक अलग तरह का मन बना सकते हैं,—
ऐसा मन, जो रुकता है, सोचता है, और बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया नहीं करता।
और, अगर ऐसे मन अधिक सामान्य हो जाएँ, तो वे जो दुनिया बनाएँगे, वह भी अलग होगी।
कम से कम, हम यह संभावना अपने बच्चोंको देसकते हैं.—
उनके भविष्य केलिए, और उस दुनिया केलिए, जिसे वे विरासत में पाएँगे।
यही बात Sam को परेशान कररही थी। उनके तर्कसंगत मन के पास इसका कोई उत्तर नहीं था।
क्या मन बिना किसी सीधे माध्यम के संवाद करसकता है? और क्या ऐसा संवाद इतना गहरा, इतना परिवर्तित करने वाला, और फिर भी इतना स्पष्ट हो सकता है?
Sam केलिए यह एक ऐसा रहस्य बना रहा जिसे वे अपने पूरे न्यूरोसाइंस ज्ञान के बावजूद कभी सुलझा नहीं पाए।
लेकिन हाँ, ऐसा लगता है कि कुछ अवस्थाओं में मन में ऐसी क्षमताएँ होती हैं। यह बिना शब्दों के भी संवाद करसकता है—सिर्फ मनुष्यों के साथ ही नहीं, बल्कि जानवरों और अन्य जीवों के साथ भी।
मैंने कुत्तों को, और यहाँ तक कि ज़हरीले साँपों को भी, एक विशेष मानसिक अवस्था में पास जाने पर पूरी तरह शांत होते देखा है।
अगर यह सच है, तो क्या केवल मानसिक शक्ति से किसी आक्रामक व्यक्ति को पूरी तरह बदलना संभव है? ऐसा होसके तो सभी संघर्ष और युद्ध समाप्त हो जाएँ।
1970 और 80 के दशक में, प्रसिद्ध भारतीय गुरु Mahesh Yogi-ने ऐसा ही दावा किया था। उन्होंने कहा कि वे ध्यान करने वालों के एक समूह को युद्धक्षेत्र में भेजकर, भीषण युद्धों को रोक सकते हैं। वे लोग चुपचाप ध्यान करेंगे—और विरोधी अपनी आक्रामकता छोड़देगा।
काश यह सच होता। इससे बहुत सी जानें और पीड़ा बच सकती थी।
लेकिन क्या वास्तव में ऐसा होता है? क्या कोई मन,—चाहे वह किसी भी अवस्था में हो—दूसरे मन को इस तरह प्रभावित करसकता है कि वह अपनी आक्रामक प्रवृत्तियाँ छोड़दे?
Maharshi और उनके अनुयायियों ने इसकेलिए 'ठोस' सिद्धांत प्रस्तुत किए। इस विषय पर उनके पास कुछ शोध-पत्र भी थे। लेकिन अधिकांश लोगों ने इसे केवल प्रचार का तरीका मानकर खारिज करदिया।
व्यक्तिगत रूप से, मैं मानता हूँ कि मन में ऐसी क्षमता हो सकती है। लेकिन क्या यह हमेशा काम करती है?
इतिहास को देखें तो, नहीं।
Buddh, जिनका मन इतना शक्तिशाली था, उन्होंने Ajathashatru जैसे अत्याचारी को भी एक ही बैठक में बदल दिया। फिर भी, वे अपने ही अनुयायियों के बीच चल रहे अंतहीन विवादों को नहीं रोक सके।
इतने दयालु और प्रेमपूर्ण Jesus Christ को भी यातनाएँ दी गईं और सूली पर चढ़ाया गया। उनके मानसिक बल का उनके अत्याचारियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
सर्वशक्तिमान Krishna भी Mahabharat युद्ध के बाद हुए भयानक नरसंहार को नहीं रोक सके।
जैसा कि मेरे एक मित्र ने मज़ाक में कहा था, एक शक्तिशाली रेडियो स्टेशन होने से कोई फायदा नहीं, अगर रेडियो चालू ही न हो, और सही तरंग पर ट्यून भी न हो। सुननेकेलिए सामने वाला ग्रहणशील होना चाहिए।
इसलिए, केवल मानसिक शक्ति से आक्रामकता को कम करना मात्र एक कल्पना है।
यह एक जिज्ञासु Sam को प्रभावित करसकता है, लेकिन उस आक्रामक व्यक्ति को नहीं, जिसकी सोच बंद है।
इसलिए मैं ध्यान को चल रहे युद्ध का समाधान नहीं बता रहा। लेकिन हाँ, यह भविष्य में ऐसे हालात बनने से रोकने का एक साधन हो सकता है।
ध्यान में अशांत मन को शांत करने की क्षमता होती है। एक शांत मन आसानी से भड़काने वाली बातों का शिकार नहीं होता। यह भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करसकता है, और तर्क केलिए जगह देता है।
इसलिए, मैं ध्यान को युद्धों से बचने केलिए एक संभावित रोकथाम के उपाय के रूप में सुझाता हूँ—एक प्रकार की पूर्व-रक्षा के रूप में, न कि बाद में व्यर्थ आग बुझाने के प्रयास के रूप में।
हमें अपने बच्चोंको उनके पालन-पोषण का हिस्सा बनाकर ध्यान की शिक्षा देनी चाहिए। इससे पूरी तरह संघर्ष-रहित दुनिया तो नहीं बनेगी, और न ही यह किसी आक्रामक व्यक्ति को बदल देगा। लेकिन यह आक्रामक व्यवहार की संभावना को निश्चित रूप से कम करेगा।
लेकिन हमें उन्हें कौन-सी ध्यान विधि सिखानी चाहिए?
आजकल बहुतसे गुरु हैं, और हरएक की अपनी अलग ध्यान तकनीक है।
• कोई तेज़ श्वास लेनेकी सलाह देता है।
• कोई श्वास को शांतहोकर देखने की बात करता है।
• कोई नाक की नोक या भौंहों के बीच देखने को कहता है।
• कोई रीढ़ में ऊपर-नीचे चलने वाली 'ऊर्जा' पर ध्यान लगानेको कहता है।
• कोई, एक अक्षर के ध्वनि पर ध्यान केंद्रित करनेको कहता है।
• कोई मंत्र जपनेको कहता है।
• कोई श्वास को शांतहोकर देखने की बात करता है।
• कोई नाक की नोक या भौंहों के बीच देखने को कहता है।
• कोई रीढ़ में ऊपर-नीचे चलने वाली 'ऊर्जा' पर ध्यान लगानेको कहता है।
• कोई, एक अक्षर के ध्वनि पर ध्यान केंद्रित करनेको कहता है।
• कोई मंत्र जपनेको कहता है।
जितने गुरु, उतनी विधियाँ।
कौन-सी सबसे अच्छी है?
यह पूछना, जैसा है कि, खाने का सबसे अच्छा तरीका कौन-सा है?
एक जापानी या चीनी व्यक्ति, चॉपस्टिक्स का उपयोग करता है। एक यूरोपीय, चाकू और कांटे का उपयोग करता है। एक भारतीय, अपने हाथोंसे खाना पसंद करता है।
• कोई भी तरीका श्रेष्ठ नहीं है, और कोई भी निम्न नहीं है।
• जब तक उद्देश्य भूख मिटाना है, कोई भी तरीका ठीक है।
• जो आपकेलिए सुविधाजनक हो, वही आपकेलिए सही है।
• बस, कोई आपसे उल्टाखड़ेहोकर खाने को न कहे, तो सब ठीक है।
• जब तक उद्देश्य भूख मिटाना है, कोई भी तरीका ठीक है।
• जो आपकेलिए सुविधाजनक हो, वही आपकेलिए सही है।
• बस, कोई आपसे उल्टाखड़ेहोकर खाने को न कहे, तो सब ठीक है।
इसी तरह, जब तक ध्यान, आपको एक शांत मन की ओर ले जाता है, वह ठीक है। जोभी आपको किसी भ्रमात्मक रास्ते पर लेजाए, उससे बचना चाहिए।
क्या इन में से कोई विधि, आपको उस सार्वभौमिक मन की अवस्था तक लेजाती है, जिसके बारे में मैंने कुछ पिछले एपिसोड में बात की थी? या ऐसे मन तक, जो दूसरोंको प्रभावित कर सके?
यह एक अलग विषय है। शायद, मैं इस पर किसीऔर समय बात करूँगा।
लेकिन कोई भी ध्यान अभ्यास, निश्चित रूप से संघर्ष की संभावना को कम करेगा,—और यही हमारी मुख्य चर्चा का विषय है।
तो आइए, याद रखें—
• विश्लेषणात्मक क्षमता का विकास,
• धर्मों की सही समझ,
• अनियंत्रित इच्छाओं पर संयम,
• और नियमित ध्यान अभ्यास।
• धर्मों की सही समझ,
• अनियंत्रित इच्छाओं पर संयम,
• और नियमित ध्यान अभ्यास।
ये त्वरित समाधान नहीं हैं।
ये रातों-रात संघर्ष खत्म नहीं करेंगे।
लेकिन ये एक अलग तरह का मन बना सकते हैं,—
ऐसा मन, जो रुकता है, सोचता है, और बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया नहीं करता।
और, अगर ऐसे मन अधिक सामान्य हो जाएँ, तो वे जो दुनिया बनाएँगे, वह भी अलग होगी।
कम से कम, हम यह संभावना अपने बच्चोंको देसकते हैं.—
उनके भविष्य केलिए, और उस दुनिया केलिए, जिसे वे विरासत में पाएँगे।
© Dr. King, Swami Satyapriya 2026

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