पिछले एपिसोड में हम चर्चा कर रहे थे कि प्राचीन भारतीय चेतना की अवधारणा को किस प्रकार देखते थे। एक विशिष्ट उदाहरण के रूप में मैंने उपनिषदों में से एक, 'माण्डूक्य उपनिषद' को लिया था। माण्डूक्य उपनिषद अथर्ववेद का एक भाग है।
यह छोटा-सा उपनिषद बताता है कि परम सत्य चेतना की चार अवस्थाओं के माध्यमसे किस प्रकार प्रकट होता है। वह उस परम सत्य को 'ॐकार' कहता है। यह चेतना की चार अवस्थाओं को जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय के रूपमें पहचानता है।
ये अवस्थाएँ ॐकार द्वारा धारण किए गए असंख्य रूपों में विद्यमान हैं। जैसा कि हमने पहले चर्चा की थी, यह निश्चित रूपसे संभव है क्योंकि ॐकार देश और काल से परे है। ॐकार के विभिन्न रूप ही पूरे ब्रह्मांडमें व्याप्त जीव हैं। चूँकि वे रूप देश और काल के नियमों के अधीन हैं, इसलिए वे एक समयमें केवल एक ही अवस्था में रहसकतेहैं।
इस एपिसोड में हम इन चार अवस्थाओं में से पहली तीन अवस्थाओं के बारेमें जानेंगे।
यह छोटा-सा उपनिषद बताता है कि परम सत्य चेतना की चार अवस्थाओं के माध्यमसे किस प्रकार प्रकट होता है। वह उस परम सत्य को 'ॐकार' कहता है। यह चेतना की चार अवस्थाओं को जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय के रूपमें पहचानता है।
ये अवस्थाएँ ॐकार द्वारा धारण किए गए असंख्य रूपों में विद्यमान हैं। जैसा कि हमने पहले चर्चा की थी, यह निश्चित रूपसे संभव है क्योंकि ॐकार देश और काल से परे है। ॐकार के विभिन्न रूप ही पूरे ब्रह्मांडमें व्याप्त जीव हैं। चूँकि वे रूप देश और काल के नियमों के अधीन हैं, इसलिए वे एक समयमें केवल एक ही अवस्था में रहसकतेहैं।
इस एपिसोड में हम इन चार अवस्थाओं में से पहली तीन अवस्थाओं के बारेमें जानेंगे।
सबसे पहली अवस्था जागने की अवस्था है, जिसे चेतना की 'जाग्रत' अवस्था कहा जाता है। इस अवस्था में जीव अपने शरीर के बाहर की दुनिया के साथ संपर्क करता है।
वह अपने शरीर के बाहर की दुनिया से जानकारी एकत्र करने केलिए अपनी पाँच ज्ञानेन्द्रियों, जैसे आँखों और कानों, का उपयोग करता है। फिर वह उस जानकारी को अपने मन, बुद्धि, अहंकार और अन्य मानसिक क्षमताओं की सहायता से संसाधित करता है।
जानकारी संसाधित होजानेकेबाद शरीर बाहरी वस्तुओं के साथ क्रिया करनेकेलिए अपने पाँच कर्मेन्द्रियों, जैसे हाथों और पैरों, का उपयोग करता है। प्राण जैसी पाँच जीवन-शक्तियाँ इस पूरी प्रक्रिया में शरीर और मन को सहारा देती हैं।
मूल रूपसे जाग्रत वह चेतना की अवस्था है जो शरीर के बाहर स्थित स्थूल वस्तुओं के साथ व्यवहार करती है।
उपनिषद इसका वर्णन इस प्रकार करता है।
तंत्रिका-विज्ञान इसे किस प्रकार देखता है?
तंत्रिका-विज्ञान की शब्दावली में इसे Access Consciousness कहा जाता है। तंत्रिका-विज्ञानी इस बातको काफी हदतक समझ चुके हैं कि शरीर और मस्तिष्क इस प्रकार की चेतना को किस प्रकार संभालते हैं।
मस्तिष्क में विभिन्न विशिष्ट क्षेत्र होते हैं जो बाहरी ज्ञानेन्द्रियों से आनेवाली जानकारी को संसाधित करते हैं। जानकारी संसाधित होजानेकेबाद मस्तिष्क प्राप्त जानकारी, अपनी वर्तमान अवस्था तथा विभिन्न निर्णय-केंद्रों के मूल्यांकन के आधारपर यह निर्णय लेता है कि कौन-सी क्रिया की जानी चाहिए। अंततः वह आवश्यकता के अनुसार मस्तिष्क के Motor regions को सक्रिय करता है ताकि बाहरी कर्मेन्द्रियाँ उचित कार्य करसकें।
उपनिषद चेतना के दूसरे रूप की चर्चा करता है, जिसे 'स्वप्न' अवस्था कहा जाता है। यह जाग्रत अवस्था से काफी मिलती-जुलती है। अंतर केवल इतना है कि पूरा नाटक मन के भीतर घटित होता है।
बाहरी स्थूल वस्तुओं के स्थानपर मन द्वारा निर्मित सूक्ष्म वस्तुएँ होती हैं। स्थूल ज्ञानेन्द्रियों के स्थानपर मन द्वारा निर्मित सूक्ष्म आंतरिक इन्द्रियाँ होती हैं। ये आंतरिक इन्द्रियाँ मन द्वारा निर्मित वस्तुओं पर कार्य करती हैं और ऐसे परिणाम उत्पन्न करती हैं जो स्वयं मन द्वारा ही निर्मित होते हैं।
जिस प्रकार जाग्रत अवस्था में व्यक्ति अपने शारीरिक अंगों और मानसिक क्षमताओं की सहायता से बाहरी वस्तुओं का अनुभव करता है, उसी प्रकार स्वप्न में निर्मित व्यक्ति भी स्वप्न में निर्मित वस्तुओं का अनुभव करता है। बाहरी संसार और स्वप्न में निर्मित आंतरिक संसार के बीच गहरी समानता है।
उपनिषद इसका वर्णन इस प्रकार करता है।
तंत्रिका-विज्ञान भी इसे लगभग इसी प्रकार देखता है। अंतर केवल इतना है कि उपनिषद की अमूर्त शब्दावली के स्थानपर वह मस्तिष्क के विशिष्ट भागों का उल्लेख करता है।
तंत्रिका-विज्ञान के अनुसार स्वप्न का संसार पूरी तरह मस्तिष्क द्वारा निर्मित होता है। यह मस्तिष्क में पहले से संग्रहीत विभिन्न स्मृतियों के बीच होनेवाली यादृच्छिक (Random) परस्पर क्रियाओं का परिणाम होता है।
वस्तुओं का मन द्वारा निर्मित होना छोड़ दें तो बाकी सबकुछ लगभग जाग्रत अवस्था जैसा ही होता है। मस्तिष्क के वही संसाधन-क्षेत्र कार्य करते रहते हैं, लेकिन भौतिक ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ सक्रिय नहीं होतीं।
उपनिषद चेतना की तीसरी अवस्था की चर्चा करता है, जिसे 'सुषुप्ति' अथवा गहरी नींद कहा जाता है। उपनिषद के अनुसार चेतना की इस अवस्था में वह न तो बाहरी संसारके साथ कोई प्रतिक्रिया करती है और न ही कोई स्वप्न देखती है।
चूँकि न तो बाहरी वस्तुओं से और न ही मन द्वारा निर्मित वस्तुओं से कोई जानकारी प्राप्त होती है, इसलिए उनका कोई संसाधन भी नहीं होता। उपनिषद कहता है कि चेतना बाहरी और आंतरिक—दोनों संसारों से पूरी तरह कट जानेके कारण इस अवस्था में कोई इच्छा भी नहीं रहती।
उपनिषद कहता है कि चेतना मानो निश्चल-सी प्रतीत होती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि यह शून्यता की अवस्था है। पहले से अर्जित ज्ञान अब भी वहीं रहता है। किंतु वह ज्ञान मानो जमे हुए रूप में रहता है।
उपनिषद एक और आश्चर्यजनक बात बताता है। वह कहता है कि चेतना की यह अवस्था आनंदमय होती है। किंतु यह आनंद किसी इन्द्रिय-सुख से उत्पन्न नहीं होता। बल्कि यह इसलिए होता है क्योंकि चेतना की अन्य दो अवस्थाओं में जो मानसिक क्लेश उपस्थित रहते हैं, वे इस अवस्था में नहीं होते। यह वह आनंद है जो किसी भी प्रकार की बाधा के अभाव में प्रकट होता है।
उपनिषद चेतना की इस अवस्था को चेतना की अन्य दो अवस्थाओं के बीच का प्रवेश-द्वार भी कहता है। इसी अवस्था से मनुष्य जाग्रत अवस्था अथवा स्वप्न अवस्था में प्रवेश करता है।
संक्षेप में उपनिषद इस अवस्था का वर्णन इस प्रकार करता है।
तंत्रिका-विज्ञान भी गहरी नींद की अवस्था की चर्चा करता है, जिसमें मनुष्य न तो बाहरी घटनाओं पर प्रतिक्रिया करता है और न ही कोई स्वप्न देखता है। इसके अतिरिक्त, सोते समय मनुष्य समय-समयपर (Periodically) इसी अवस्था से जाग्रत अवस्था अथवा स्वप्न अवस्था में प्रवेश करता है।
उपनिषद चेतना की इन तीन अवस्थाओं की चर्चा ऐसे करते हैं मानो वे वास्तविक तथ्य हों। यद्यपि उनका वर्णन बहुत गहराईतक नहीं जाता, फिर भी वह तंत्रिका-विज्ञान की व्याख्याओं से टकराता नहीं है।
इन सभी प्रक्रियाओं का अंतिम अनुभवकर्ता कौन है, इस विषयमें तंत्रिका-विज्ञान मौन रहता है। या फिर, कम-से-कम इस विषयपर वह कोई निश्चित मत नहीं रखता।
दूसरी ओर, उपनिषद दृढ़तापूर्वक मानता है कि इन सभी क्रियाओं के पीछे एक शक्ति है और वही शक्ति इन सबका वास्तविक अनुभवकर्ता है। वह कहता है कि यह शक्ति शरीरका उपयोग एक उपकरण के रूपमें करती है। भारतीय सांख्य दर्शन के दार्शनिकों के अनुसार, यदि कोई अनुभवकर्ता ही नहो, तो ये सारी प्रक्रियाएँ अर्थहीन होजाएँगी।
पिछले एपिसोडों में हमने चेतना के बारेमें डेविड चाल्मर्स जैसे Cognitive philosophers के विचारों की भी चर्चा की थी।
चाल्मर्स जैसे लोग मुख्य रूपसे चेतना की पहली अवस्था पर ही अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। यद्यपि वे इन सबके पीछे किसी शक्ति की चर्चा करनेसे बचते हैं, फिर भी वे स्वीकार करते हैं कि चेतना का एक व्यक्तिनिष्ठ (Subjective) पक्ष होता है। उनका कहना है कि इस व्यक्तिनिष्ठ पक्ष की व्याख्या केवल मस्तिष्क की कार्यप्रणाली के आधारपर नहीं की जा सकती।
एक प्रकारसे, चाहे वे इसे स्वीकार करना चाहें या नहीं, वे यह मान लेते हैं कि चेतना के पीछे ऐसी कोई सत्ता अवश्य है जो ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों से परे है, जो मस्तिष्क और उसकी कार्यप्रणाली से भी परे है।
किन्तु उपनिषद जिस चौथी चेतना-अवस्था की चर्चा करता है, वह तंत्रिका-विज्ञानियों और Cognitive philosophers—दोनों को आश्चर्यचकित करदेगी। वह उन्हें अपने-अपने दृष्टिकोणों पर पुनर्विचार करनेकेलिए विवश करदेगी।
उस अवस्था की चर्चा हम अगले एपिसोड में करेंगे।
वह अपने शरीर के बाहर की दुनिया से जानकारी एकत्र करने केलिए अपनी पाँच ज्ञानेन्द्रियों, जैसे आँखों और कानों, का उपयोग करता है। फिर वह उस जानकारी को अपने मन, बुद्धि, अहंकार और अन्य मानसिक क्षमताओं की सहायता से संसाधित करता है।
जानकारी संसाधित होजानेकेबाद शरीर बाहरी वस्तुओं के साथ क्रिया करनेकेलिए अपने पाँच कर्मेन्द्रियों, जैसे हाथों और पैरों, का उपयोग करता है। प्राण जैसी पाँच जीवन-शक्तियाँ इस पूरी प्रक्रिया में शरीर और मन को सहारा देती हैं।
मूल रूपसे जाग्रत वह चेतना की अवस्था है जो शरीर के बाहर स्थित स्थूल वस्तुओं के साथ व्यवहार करती है।
उपनिषद इसका वर्णन इस प्रकार करता है।
तंत्रिका-विज्ञान इसे किस प्रकार देखता है?
तंत्रिका-विज्ञान की शब्दावली में इसे Access Consciousness कहा जाता है। तंत्रिका-विज्ञानी इस बातको काफी हदतक समझ चुके हैं कि शरीर और मस्तिष्क इस प्रकार की चेतना को किस प्रकार संभालते हैं।
मस्तिष्क में विभिन्न विशिष्ट क्षेत्र होते हैं जो बाहरी ज्ञानेन्द्रियों से आनेवाली जानकारी को संसाधित करते हैं। जानकारी संसाधित होजानेकेबाद मस्तिष्क प्राप्त जानकारी, अपनी वर्तमान अवस्था तथा विभिन्न निर्णय-केंद्रों के मूल्यांकन के आधारपर यह निर्णय लेता है कि कौन-सी क्रिया की जानी चाहिए। अंततः वह आवश्यकता के अनुसार मस्तिष्क के Motor regions को सक्रिय करता है ताकि बाहरी कर्मेन्द्रियाँ उचित कार्य करसकें।
उपनिषद चेतना के दूसरे रूप की चर्चा करता है, जिसे 'स्वप्न' अवस्था कहा जाता है। यह जाग्रत अवस्था से काफी मिलती-जुलती है। अंतर केवल इतना है कि पूरा नाटक मन के भीतर घटित होता है।
बाहरी स्थूल वस्तुओं के स्थानपर मन द्वारा निर्मित सूक्ष्म वस्तुएँ होती हैं। स्थूल ज्ञानेन्द्रियों के स्थानपर मन द्वारा निर्मित सूक्ष्म आंतरिक इन्द्रियाँ होती हैं। ये आंतरिक इन्द्रियाँ मन द्वारा निर्मित वस्तुओं पर कार्य करती हैं और ऐसे परिणाम उत्पन्न करती हैं जो स्वयं मन द्वारा ही निर्मित होते हैं।
जिस प्रकार जाग्रत अवस्था में व्यक्ति अपने शारीरिक अंगों और मानसिक क्षमताओं की सहायता से बाहरी वस्तुओं का अनुभव करता है, उसी प्रकार स्वप्न में निर्मित व्यक्ति भी स्वप्न में निर्मित वस्तुओं का अनुभव करता है। बाहरी संसार और स्वप्न में निर्मित आंतरिक संसार के बीच गहरी समानता है।
उपनिषद इसका वर्णन इस प्रकार करता है।
तंत्रिका-विज्ञान भी इसे लगभग इसी प्रकार देखता है। अंतर केवल इतना है कि उपनिषद की अमूर्त शब्दावली के स्थानपर वह मस्तिष्क के विशिष्ट भागों का उल्लेख करता है।
तंत्रिका-विज्ञान के अनुसार स्वप्न का संसार पूरी तरह मस्तिष्क द्वारा निर्मित होता है। यह मस्तिष्क में पहले से संग्रहीत विभिन्न स्मृतियों के बीच होनेवाली यादृच्छिक (Random) परस्पर क्रियाओं का परिणाम होता है।
वस्तुओं का मन द्वारा निर्मित होना छोड़ दें तो बाकी सबकुछ लगभग जाग्रत अवस्था जैसा ही होता है। मस्तिष्क के वही संसाधन-क्षेत्र कार्य करते रहते हैं, लेकिन भौतिक ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ सक्रिय नहीं होतीं।
उपनिषद चेतना की तीसरी अवस्था की चर्चा करता है, जिसे 'सुषुप्ति' अथवा गहरी नींद कहा जाता है। उपनिषद के अनुसार चेतना की इस अवस्था में वह न तो बाहरी संसारके साथ कोई प्रतिक्रिया करती है और न ही कोई स्वप्न देखती है।
चूँकि न तो बाहरी वस्तुओं से और न ही मन द्वारा निर्मित वस्तुओं से कोई जानकारी प्राप्त होती है, इसलिए उनका कोई संसाधन भी नहीं होता। उपनिषद कहता है कि चेतना बाहरी और आंतरिक—दोनों संसारों से पूरी तरह कट जानेके कारण इस अवस्था में कोई इच्छा भी नहीं रहती।
उपनिषद कहता है कि चेतना मानो निश्चल-सी प्रतीत होती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि यह शून्यता की अवस्था है। पहले से अर्जित ज्ञान अब भी वहीं रहता है। किंतु वह ज्ञान मानो जमे हुए रूप में रहता है।
उपनिषद एक और आश्चर्यजनक बात बताता है। वह कहता है कि चेतना की यह अवस्था आनंदमय होती है। किंतु यह आनंद किसी इन्द्रिय-सुख से उत्पन्न नहीं होता। बल्कि यह इसलिए होता है क्योंकि चेतना की अन्य दो अवस्थाओं में जो मानसिक क्लेश उपस्थित रहते हैं, वे इस अवस्था में नहीं होते। यह वह आनंद है जो किसी भी प्रकार की बाधा के अभाव में प्रकट होता है।
उपनिषद चेतना की इस अवस्था को चेतना की अन्य दो अवस्थाओं के बीच का प्रवेश-द्वार भी कहता है। इसी अवस्था से मनुष्य जाग्रत अवस्था अथवा स्वप्न अवस्था में प्रवेश करता है।
संक्षेप में उपनिषद इस अवस्था का वर्णन इस प्रकार करता है।
तंत्रिका-विज्ञान भी गहरी नींद की अवस्था की चर्चा करता है, जिसमें मनुष्य न तो बाहरी घटनाओं पर प्रतिक्रिया करता है और न ही कोई स्वप्न देखता है। इसके अतिरिक्त, सोते समय मनुष्य समय-समयपर (Periodically) इसी अवस्था से जाग्रत अवस्था अथवा स्वप्न अवस्था में प्रवेश करता है।
उपनिषद चेतना की इन तीन अवस्थाओं की चर्चा ऐसे करते हैं मानो वे वास्तविक तथ्य हों। यद्यपि उनका वर्णन बहुत गहराईतक नहीं जाता, फिर भी वह तंत्रिका-विज्ञान की व्याख्याओं से टकराता नहीं है।
इन सभी प्रक्रियाओं का अंतिम अनुभवकर्ता कौन है, इस विषयमें तंत्रिका-विज्ञान मौन रहता है। या फिर, कम-से-कम इस विषयपर वह कोई निश्चित मत नहीं रखता।
दूसरी ओर, उपनिषद दृढ़तापूर्वक मानता है कि इन सभी क्रियाओं के पीछे एक शक्ति है और वही शक्ति इन सबका वास्तविक अनुभवकर्ता है। वह कहता है कि यह शक्ति शरीरका उपयोग एक उपकरण के रूपमें करती है। भारतीय सांख्य दर्शन के दार्शनिकों के अनुसार, यदि कोई अनुभवकर्ता ही नहो, तो ये सारी प्रक्रियाएँ अर्थहीन होजाएँगी।
पिछले एपिसोडों में हमने चेतना के बारेमें डेविड चाल्मर्स जैसे Cognitive philosophers के विचारों की भी चर्चा की थी।
चाल्मर्स जैसे लोग मुख्य रूपसे चेतना की पहली अवस्था पर ही अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। यद्यपि वे इन सबके पीछे किसी शक्ति की चर्चा करनेसे बचते हैं, फिर भी वे स्वीकार करते हैं कि चेतना का एक व्यक्तिनिष्ठ (Subjective) पक्ष होता है। उनका कहना है कि इस व्यक्तिनिष्ठ पक्ष की व्याख्या केवल मस्तिष्क की कार्यप्रणाली के आधारपर नहीं की जा सकती।
एक प्रकारसे, चाहे वे इसे स्वीकार करना चाहें या नहीं, वे यह मान लेते हैं कि चेतना के पीछे ऐसी कोई सत्ता अवश्य है जो ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों से परे है, जो मस्तिष्क और उसकी कार्यप्रणाली से भी परे है।
किन्तु उपनिषद जिस चौथी चेतना-अवस्था की चर्चा करता है, वह तंत्रिका-विज्ञानियों और Cognitive philosophers—दोनों को आश्चर्यचकित करदेगी। वह उन्हें अपने-अपने दृष्टिकोणों पर पुनर्विचार करनेकेलिए विवश करदेगी।
उस अवस्था की चर्चा हम अगले एपिसोड में करेंगे।
--------------------------------------------------------------------
अगर यह बात आपके दिल को छू गई, तो मैं आपको अपने साप्ताहिक पाठकों के समूह में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित करता हूँ। हर शनिवार को, मैं एक गहन विश्लेषण प्रकाशित करता हूँ जो केवल ऊपरी बातों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन सवालों पर रोशनी डालता है जो वास्तव में मायने रखते हैं। कोई Paywall नहीं, कोई Clickbait नहीं—बस एक सीधा संवाद: मेरे विचारों से सीधे आपके विचारों तक। सब्सक्राइब करने के लिए यहाँ क्लिक करें।
© Dr. King, Swami Satyapriya 2026

No comments:
Post a Comment