बस एक पीढ़ी पहले, कहानी सुनानेकी एक परंपरा थी। हर बच्चा अपनी दादीकी गोदमें बड़ा होताथा, और वह अद्भुत कहानियोंसे बच्चेको मंत्रमुग्ध कर देती थी। इन कहानियोंका बच्चेपर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ताथा।
इन कहानियोंमें आमतौरपर एक नैतिक मूल्य या सीख होती थी, जिसे रोचक ढंगसे प्रस्तुत कियाजाता था। वे शक्कर चढ़ी हुई गोलियोंकी तरह थीं। भलेही भीतरकी दवा स्वादिष्ट न हो, लेकिन शक्करकी परत उसे आनंददायक बना देती थी। बिना जानेही बच्चा कड़वी दवा निगल लेताथा, और उसकी ऊपरी मिठासका आनंद लेताथा।
इन कहानियोंमें आमतौरपर एक नैतिक मूल्य या सीख होती थी, जिसे रोचक ढंगसे प्रस्तुत कियाजाता था। वे शक्कर चढ़ी हुई गोलियोंकी तरह थीं। भलेही भीतरकी दवा स्वादिष्ट न हो, लेकिन शक्करकी परत उसे आनंददायक बना देती थी। बिना जानेही बच्चा कड़वी दवा निगल लेताथा, और उसकी ऊपरी मिठासका आनंद लेताथा।
हमारा मस्तिष्क दूसरोंकी नकल करनेमें निपुण होताहै। और जरूरी नहींकि ये दूसरे वास्तविक लोग ही हों; वे कहानियोंके काल्पनिक पात्र भी हो सकते हैं। इसलिए, कहानियोंका वास्तविक उद्देश्य मनोरंजनके बहाने व्यक्तित्वको आकार देना है। यहाँ मैं उस प्रक्रिया की बात कर रहा हूँ जिसमें बच्चा बड़ा होते हुए अपना व्यवहार विकसित करताहै।
हम अक्सर उन आंतरिक आवाज़ोंके बारेमें बात करते हैं जो हमें निर्णय लेते समय मार्गदर्शन देती हैं। हम उसीके आधारपर कार्य करते हैं जो मानो हमारे भीतरसे उठता हुआ प्रतीत होताहै।
मैं यह नहीं कह रहा कि किसी व्यक्तिमें जन्मजात आंतरिक आवाज़ नहीं हो सकती। लेकिन अधिकांश मामलोंमें, जैसे-जैसे हम इन कहानियोंको सुनते हुए बड़े होते हैं, ये आंतरिक आवाज़ें धीरे-धीरे बनती हैं।
ये कहानियाँ हमारे अवचेतनको संस्कारित करनेका काम करती हैं। जब कोई समान परिस्थिति सामने आती है, तो बिना किसी सचेत चयनके भी मस्तिष्क अपनेआप सही दिशा सुझा देताहै।
यह व्यक्तित्व निर्माण इस तरह भी हो सकताहै कि किसी महाकाव्यके नायकको आदर्शके रूपमें प्रस्तुत कियाजाए। नायकको अत्यधिक आदर्शीकृत कियाजासकताहै। खलनायक और उसके कर्मोंके परिणामस्वरूप उसे मिलनेवाले कष्टोंपर ध्यान केंद्रित करके, ये कहानियाँ अस्वीकार्य गुणोंको दिखाती हैं। उस महाकाव्यका कोई ऐतिहासिक महत्व हो या न हो, या वह पूरी तरह काल्पनिक ही क्यों न हो—इससे कोई फर्क नहीं पड़ताहै।
लगभग हर समाजमें ऐसी कहानियाँ होती हैं जो मनोरंजनके बहाने हमारी सोचको आकार देती हैं। फिर भी, हम अक्सर अपने मानसिक विकासमें इन कहानियोंके महत्वको पहचाननेमें असफल रहते हैं।
मैंने लोगोंको रामायण या महाभारत जैसे महान भारतीय महाकाव्योंकी ऐतिहासिकतापर बहस करते हुए देखा है। दूसरी ओर, मैंने आधुनिक राष्ट्रवादियोंको उनकी ऐतिहासिकता सिद्ध करनेमें लगे हुए भी देखा है। लेकिन इस भ्रममें हम इन कहानियोंके एक महत्वपूर्ण पहलूको भूल जाते हैं।
रामायण या महाभारत जैसे भारतीय महाकाव्य उद्देश्यपूर्ण कथनोंसे भरे हुए हैं। उनका चित्रण यथार्थसे अधिक नाटकीय होताहै।
नायक हर तरहसे प्रशंसनीय होताहै, और खलनायक हर तरहसे घृणाके योग्य होताहै। ऐसा चित्रण इन कहानियोंको अवास्तविक और काल्पनिक जैसा दिखा सकताहै।
कई लोग इन्हें केवल मिथक कहकर खारिज कर देते हैं। कुछ लोग इनमें ऐतिहासिक सच्चाई और "वास्तविकता" खोजते हैं।
लेकिन यहीं हम गलती करते हैं।
वास्तवमें, ये कहानियाँ अपनी ऐतिहासिक सटीकतासे अधिक, मनपर अपने प्रभावके कारण अधिक मूल्यवान हैं।
यह केवल भारततक सीमित नहीं है। दुनियाका हर समाज, चाहे उसकी धार्मिक पृष्ठभूमि और इतिहास कुछभी हो, इस चरणसे गुजरा है।
कई आधुनिक समाज इन कहानियोंको बहुत पहले पीछे छोड़ चुके हैं। उन्होंने इन्हें धार्मिक थोपने या बिना किसी सारवाली कल्पनाके रूपमें अस्वीकार कर दिया है।
सौभाग्यसे, भारतमें अभीभी बहुतसे लोग कहानी सुनानेकी परंपराको पसंद करते हैं। भलेही इन कहानियोंका स्रोत दादीकी गोदसे टीवी स्क्रीनतक स्थानांतरित हो गया हो, फिरभी उनमें वही उद्देश्य पूरा करनेकी क्षमता बनी हुई है।
लेकिन दुर्भाग्यसे, आधुनिकता और नई तकनीकोंने इन कहानियोंके वास्तविक उद्देश्यकी तुलना में उनके मनोरंजन पक्षपर अधिक जोर देना शुरू कर दिया है। इससे नई पीढ़ीके व्यक्तित्व निर्माणमें एक खालीपन पैदाहोरहाहै।
कोईभी खालीपन अवांछित प्रभावोंके लिए खुला निमंत्रण होताहै। वह धीरे-धीरे मूल प्रवृत्तियोंसे भर जाताहै, और परिणामस्वरूप अत्यधिक व्यक्ति-केंद्रित बन जाताहै। यह एक स्वस्थ समाजके लिए आवश्यक सामूहिक दृष्टिकोणके साथ टकराव पैदा कर सकताहै।
एक और नकारात्मक प्रवृत्ति भी है। कभी-कभी इन कहानियोंका उपयोग कुछ धार्मिक मान्यताओंको बढ़ावा देनेके साधनके रूपमें कियाजाताहै।
सही और गलतका निर्धारण किसी क्रियाके परिणामोंके आधारपर होना चाहिए। लेकिन जब उन्हें इस आधारपर आंका जाताहै कि वे किसी धार्मिक ग्रंथके आदेशोंके साथ कितने मेल खाते हैं, तो एक स्वस्थ समाजका हिस्सा बनकर जीना पीछे छूट जाताहै। किसी देवताके अधीन होना ही मुख्य बन जाताहै।
ऐसा परिवर्तन धर्म-प्रेरित घृणा और संघर्षोंको जन्म दे सकताहै।
अब समय आ गया है कि हम अपने जीवनमें धर्मकी भूमिकाको बढ़ा-चढ़ाकर देखनेके खतरोंको पहचानें।
सौभाग्यसे, कुछ लोगोंने इन खतरोंको समझना शुरू कर दिया है। "धर्म मनुष्यके लिए"का विचार "मनुष्य धर्मके लिए"की जगह ले रहाहै। यह एक बहुतही उत्साहजनक विकास है।
दूसरी ओर, …
दुनियाके विकसित हिस्सोंमें पारिवारिक व्यवस्थाएँ पहलेही टूट चुकी हैं। दादियाँ वृद्धाश्रमोंमें चली गई हैं या अकेले रह रही हैं। कोई कहानी सुनाना नहीं है—सिर्फ "अकेलेपनकी कहानियाँ" ही बची हैं।
आंतरिक आवाज़ें अब मूल प्रवृत्तियोंद्वारा निर्देशित हो रही हैं। भारत जैसे देशोंमें भी एकल परिवार तेजीसे बढ़ रहे हैं, जिससे बढ़ते हुए बच्चेके मनमें एक खालीपन पैदाहोरहाहै।
कोईभी खालीपन परेशान करनेवाली प्रवृत्तियोंके लिए खुला निमंत्रण होताहै। अब समय है कि हम इन गलतियोंको पहचानें।
यदि संभव हो, दादियोंको वापसलाओ, और कहानी सुनानेका आनंद उसके वास्तविक मूल्यके लिए लो। और यह आनंद अपने बच्चोंको भी दो।
हम अक्सर उन आंतरिक आवाज़ोंके बारेमें बात करते हैं जो हमें निर्णय लेते समय मार्गदर्शन देती हैं। हम उसीके आधारपर कार्य करते हैं जो मानो हमारे भीतरसे उठता हुआ प्रतीत होताहै।
मैं यह नहीं कह रहा कि किसी व्यक्तिमें जन्मजात आंतरिक आवाज़ नहीं हो सकती। लेकिन अधिकांश मामलोंमें, जैसे-जैसे हम इन कहानियोंको सुनते हुए बड़े होते हैं, ये आंतरिक आवाज़ें धीरे-धीरे बनती हैं।
ये कहानियाँ हमारे अवचेतनको संस्कारित करनेका काम करती हैं। जब कोई समान परिस्थिति सामने आती है, तो बिना किसी सचेत चयनके भी मस्तिष्क अपनेआप सही दिशा सुझा देताहै।
यह व्यक्तित्व निर्माण इस तरह भी हो सकताहै कि किसी महाकाव्यके नायकको आदर्शके रूपमें प्रस्तुत कियाजाए। नायकको अत्यधिक आदर्शीकृत कियाजासकताहै। खलनायक और उसके कर्मोंके परिणामस्वरूप उसे मिलनेवाले कष्टोंपर ध्यान केंद्रित करके, ये कहानियाँ अस्वीकार्य गुणोंको दिखाती हैं। उस महाकाव्यका कोई ऐतिहासिक महत्व हो या न हो, या वह पूरी तरह काल्पनिक ही क्यों न हो—इससे कोई फर्क नहीं पड़ताहै।
लगभग हर समाजमें ऐसी कहानियाँ होती हैं जो मनोरंजनके बहाने हमारी सोचको आकार देती हैं। फिर भी, हम अक्सर अपने मानसिक विकासमें इन कहानियोंके महत्वको पहचाननेमें असफल रहते हैं।
मैंने लोगोंको रामायण या महाभारत जैसे महान भारतीय महाकाव्योंकी ऐतिहासिकतापर बहस करते हुए देखा है। दूसरी ओर, मैंने आधुनिक राष्ट्रवादियोंको उनकी ऐतिहासिकता सिद्ध करनेमें लगे हुए भी देखा है। लेकिन इस भ्रममें हम इन कहानियोंके एक महत्वपूर्ण पहलूको भूल जाते हैं।
रामायण या महाभारत जैसे भारतीय महाकाव्य उद्देश्यपूर्ण कथनोंसे भरे हुए हैं। उनका चित्रण यथार्थसे अधिक नाटकीय होताहै।
नायक हर तरहसे प्रशंसनीय होताहै, और खलनायक हर तरहसे घृणाके योग्य होताहै। ऐसा चित्रण इन कहानियोंको अवास्तविक और काल्पनिक जैसा दिखा सकताहै।
कई लोग इन्हें केवल मिथक कहकर खारिज कर देते हैं। कुछ लोग इनमें ऐतिहासिक सच्चाई और "वास्तविकता" खोजते हैं।
लेकिन यहीं हम गलती करते हैं।
वास्तवमें, ये कहानियाँ अपनी ऐतिहासिक सटीकतासे अधिक, मनपर अपने प्रभावके कारण अधिक मूल्यवान हैं।
यह केवल भारततक सीमित नहीं है। दुनियाका हर समाज, चाहे उसकी धार्मिक पृष्ठभूमि और इतिहास कुछभी हो, इस चरणसे गुजरा है।
कई आधुनिक समाज इन कहानियोंको बहुत पहले पीछे छोड़ चुके हैं। उन्होंने इन्हें धार्मिक थोपने या बिना किसी सारवाली कल्पनाके रूपमें अस्वीकार कर दिया है।
सौभाग्यसे, भारतमें अभीभी बहुतसे लोग कहानी सुनानेकी परंपराको पसंद करते हैं। भलेही इन कहानियोंका स्रोत दादीकी गोदसे टीवी स्क्रीनतक स्थानांतरित हो गया हो, फिरभी उनमें वही उद्देश्य पूरा करनेकी क्षमता बनी हुई है।
लेकिन दुर्भाग्यसे, आधुनिकता और नई तकनीकोंने इन कहानियोंके वास्तविक उद्देश्यकी तुलना में उनके मनोरंजन पक्षपर अधिक जोर देना शुरू कर दिया है। इससे नई पीढ़ीके व्यक्तित्व निर्माणमें एक खालीपन पैदाहोरहाहै।
कोईभी खालीपन अवांछित प्रभावोंके लिए खुला निमंत्रण होताहै। वह धीरे-धीरे मूल प्रवृत्तियोंसे भर जाताहै, और परिणामस्वरूप अत्यधिक व्यक्ति-केंद्रित बन जाताहै। यह एक स्वस्थ समाजके लिए आवश्यक सामूहिक दृष्टिकोणके साथ टकराव पैदा कर सकताहै।
एक और नकारात्मक प्रवृत्ति भी है। कभी-कभी इन कहानियोंका उपयोग कुछ धार्मिक मान्यताओंको बढ़ावा देनेके साधनके रूपमें कियाजाताहै।
सही और गलतका निर्धारण किसी क्रियाके परिणामोंके आधारपर होना चाहिए। लेकिन जब उन्हें इस आधारपर आंका जाताहै कि वे किसी धार्मिक ग्रंथके आदेशोंके साथ कितने मेल खाते हैं, तो एक स्वस्थ समाजका हिस्सा बनकर जीना पीछे छूट जाताहै। किसी देवताके अधीन होना ही मुख्य बन जाताहै।
ऐसा परिवर्तन धर्म-प्रेरित घृणा और संघर्षोंको जन्म दे सकताहै।
अब समय आ गया है कि हम अपने जीवनमें धर्मकी भूमिकाको बढ़ा-चढ़ाकर देखनेके खतरोंको पहचानें।
सौभाग्यसे, कुछ लोगोंने इन खतरोंको समझना शुरू कर दिया है। "धर्म मनुष्यके लिए"का विचार "मनुष्य धर्मके लिए"की जगह ले रहाहै। यह एक बहुतही उत्साहजनक विकास है।
दूसरी ओर, …
दुनियाके विकसित हिस्सोंमें पारिवारिक व्यवस्थाएँ पहलेही टूट चुकी हैं। दादियाँ वृद्धाश्रमोंमें चली गई हैं या अकेले रह रही हैं। कोई कहानी सुनाना नहीं है—सिर्फ "अकेलेपनकी कहानियाँ" ही बची हैं।
आंतरिक आवाज़ें अब मूल प्रवृत्तियोंद्वारा निर्देशित हो रही हैं। भारत जैसे देशोंमें भी एकल परिवार तेजीसे बढ़ रहे हैं, जिससे बढ़ते हुए बच्चेके मनमें एक खालीपन पैदाहोरहाहै।
कोईभी खालीपन परेशान करनेवाली प्रवृत्तियोंके लिए खुला निमंत्रण होताहै। अब समय है कि हम इन गलतियोंको पहचानें।
यदि संभव हो, दादियोंको वापसलाओ, और कहानी सुनानेका आनंद उसके वास्तविक मूल्यके लिए लो। और यह आनंद अपने बच्चोंको भी दो।
© Dr. King, Swami Satyapriya 2026

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