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Friday, May 29, 2026

[Hindi] क्या हमारे पास स्वतंत्र इच्छा है?

 
 
 
 
दशकों पहले, Benjamin Libet नामक एक अमेरिकी न्यूरोसाइंटिस्ट ने इसे निश्चित-करनेका प्रयास किया। उनके-द्वारा किए-गए प्रयोगोंने उस-समय बहुत बड़ा सनसनीखेज प्रभाव पैदा किया था, और आजभी न्यूरोसाइंटिस्टोंके-बीच इस विषयपर चर्चाएँ चलती-रहतीहैं।

आख़िर लिबेटने किया क्या था?
लिबेटने एक अत्यंत सरल प्रयोग किया। उस प्रयोगमें भाग-लेनेवालोंसे कहा गया कि वे अपनी इच्छासे एक बटन दबाएँ। एक सटीक घड़ीका उपयोग-करके उन्हें यह दर्ज-करनेकेलिए कहा गया कि उन्होंने बटन दबानेका निर्णय किस क्षण लिया। साथही, उन्होंने वास्तवमें बटन कब दबाया, यह समयभी दर्ज किया गया।

लिबेटने एक और काम किया। उन्होंने प्रतिभागियोंके सिरपर प्रोब्स लगाए और उनके मस्तिष्कके भीतर होनेवाले कुछ विशेष विद्युत संकेतोंको मापा। ये संकेत इस-बातको दर्शातेथे कि मस्तिष्क किसी शारीरिक क्रियाकेलिए तैयारी कररहाथा।

स्वाभाविक रूपसे, बटन दबानेका निर्णय लेने और वास्तवमें उसे दबानेकेबीच थोड़ा समयांतर तो होना ही चाहिए। इसमें कुछभी अजीब नहींहै। मनके निर्णयको क्रियामें बदलनेकेलिए शरीरको थोड़ा समय लगताहीहै।

आश्चर्यकी बात यहथी कि प्रतिभागियोंके सचेत रूपसे बटन दबानेका निर्णय लेनेसे पहलेही उनका मस्तिष्क उस कार्यकेलिए तैयारी शुरू-करचुकाथा। प्रोब्सके माध्यमसे मापीगई विद्युत गतिविधियोंने यही दिखाया!

इससे कई प्रश्न उत्पन्न हुए। प्रतिभागियोंके निर्णय लेनेसे पहलेही मस्तिष्क उस कार्यकेलिए तैयारी कैसे करसकताथा? या फिर क्या वही मस्तिष्कीय गतिविधि प्रतिभागियोंको निर्णय लेनेकेलिए प्रेरित कररहीथी? यदि ऐसा था, तो इसका अर्थ यह हुआ कि प्रतिभागियोंने वह कार्य वास्तवमें अपनी स्वतंत्र इच्छासे नहीं किया था, जैसा वे समझरहेथे।

इस प्रयोगने अनेक बहसों और नई सिद्धांतोंको जन्म दिया। अनेक वैज्ञानिकोंने इसे इस-बातका प्रमाण माना कि स्वतंत्र इच्छा जैसी कोई चीज़ होतीहीनहीं, और हर चीज़ पूरीतरह कारण-चालित होतीहै।

हालाँकि स्वयं लिबेटने यह पुष्टि कीथी कि प्रतिभागी अंतिम क्षणमें अपने पहलेके निर्णयको बदलनेमें सक्षमथे, फिरभी ये बहसें नहीं रुकीं।

स्वतंत्र इच्छा न्यूरोसाइंटिस्टोंके-बीच सबसे अधिक चर्चा किए-जानेवाले विषयोंमेंसे एकहै। उन्हें लगताहै कि यदि वे ऐसी किसी चीज़को स्वीकार करलें, तो वह "डिब्बेके भीतरके शैतान" जैसी अवधारणाओंकेलिए रास्ता खोलदेगा।

अर्थात, यह स्वीकार-करने जैसा होगा कि हमारे मनको नियंत्रित-करनेवाली, मस्तिष्कसे परे कोई रहस्यमय शक्ति मौजूदहै। यह स्वीकार-करने जैसा होगा कि हमारी सभी क्रियाओंके पीछे कोई चेतना या आत्मा है। अर्थात, किसी अभौतिक अस्तित्वको स्वीकार करना।

यह विज्ञानके मज़बूत किलेको भेद-देने जैसा होगा। क्योंकि विज्ञान ऐसी किसीभी अवधारणाको स्वीकार नहींकरता।

एक दार्शनिककी तरह सोचनेवाला व्यक्ति होनेकेनाते, इस विषयपर मेरा दृष्टिकोण थोड़ा भिन्नहै। मैं स्वतंत्र इच्छाको "है या नहींहै" जैसे बाइनरी रूपमें नहीं देखता। बल्कि मैं इसे संभावनाओंके एक निरंतर क्रम के रूपमें देखताहूँ। इसमें निर्जीव वस्तुएँ, जीव-जंतु, मनुष्य, और इस क्रमकी अंतिम सीमा — सब शामिलहैं।

मैं इसे इस प्रकार समझाताहूँ।

एक पंखेको उदाहरणके रूपमें लीजिए। वह चलसकताहै या स्थिर रहसकताहै। वह अपनी गति भी बदलसकताहै। लेकिन यह सब तभी संभवहै जब कोई स्विच ऑन या ऑफ करे, या रेग्युलेटर घुमाए। अपनेआप वह कुछभी नहीं करसकताहै। यह स्वतंत्र इच्छाके पूर्ण अभावका स्पष्ट उदाहरणहै।

अब एक पशुको देखिए। वहभी चलताहै, खाताहै, साथी खोजताहै, और बहुतकुछ करताहै। वहाँ कोई भौतिक स्विच नहीं होताजो उसे ऐसा करनेकेलिए प्रेरित करे। वह पशु अपनी प्राकृतिक प्रवृत्तियों या अपने मस्तिष्क और शरीरमें स्रवित होनेवाले "रसायनों"द्वारा संचालित होताहै। उस सीमाके भीतर वह स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित करताहै। अर्थात, उसमें "स्वतंत्र इच्छा"का एक सीमित रूप मौजूदहै।

अब मनुष्योंका उदाहरण लेतेहैं। यद्यपि हममेंसे बहुतसे लोग अभीभी प्रवृत्तियोंद्वारा संचालित होतेहैं, फिरभी हम उन प्रवृत्तियोंसे ऊपर उठकर अपनी इच्छाके अनुसार व्यवहार करसकतेहैं। जब हमें भूख लगतीहै, तो हम किसी कुत्तेकी तरह भोजनपर टूट नहीं पड़ते। बल्कि हम सोचतेहैं कि हमारे सामने रखा भोजन खाना उचितहै या नहीं।

हमारे निर्णयको अनेक बातें नियंत्रित करतीहैं — क्या वह भोजन हमारा है?, क्या यह खानेका सही समयहै?, क्या वह भोजन हमारे स्वास्थ्यकेलिए अच्छा है?, आदि।

हम किसी कार्यमें संलग्न होसकतेहैं, लेकिन हमारी क्रियाएँ पूरीतरह अनियंत्रित नहीं होतीं। उन्हें हमारी नैतिक चेतना, सामाजिक ज़िम्मेदारी, स्वास्थ्यकी चिंता आदि नियंत्रित करतीहैं।

इसलिए, यद्यपि हमारेपास स्वतंत्र इच्छा है, हमारेपास आत्म-नियंत्रण भीहै। और यह आत्म-नियंत्रण भी स्वतंत्र इच्छाका ही एक और रूपहै। यह किसी निर्जीव वस्तुको नियंत्रित-करनेवाली भौतिक बाधाओं या निम्न स्तरके जीवोंको संचालित-करनेवाली प्रवृत्तिगत शक्तियोंसे ऊपर उठसकताहै।

अब इससेभी आगे बढ़तेहैं। एक संन्यासीको देखिए। वह आध्यात्मिक ज्ञानोदयकी अपनी अंतिम अवस्थातक पहुँचनेकेलिए अपनी सभी मूलभूत प्रवृत्तियोंसे संघर्ष करताहै, सभी कष्टोंको सहताहै, और अपने चुनेहुए मार्गपर दृढ़तासे चलता रहताहै। क्या वहभी स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित नहीं कररहाहै?

लेकिन वहभी किसी अंतिम आध्यात्मिक अवस्थामें विश्वास और उसे प्राप्त-करनेकी तीव्र इच्छासे बँधाहुआहै। इसलिए उसके निर्णयभी पूरीतरह स्वतंत्र नहींहैं। उनके पीछेभी कोई कारण मौजूदहै।

आपने ऐसे अनेक धर्मप्रचारकोंके बारेमें सुना होगा जो अपने धर्मका प्रचार-करनेके एकमात्र उद्देश्यसे सभी सांसारिक सुखोंका त्याग करदेतेहैं। वे अपना देश छोड़देतेहैं, किसी अपरिचित देशमें संन्यासी जैसा जीवन चुनतेहैं और अपने मार्गपर लगे रहतेहैं।

लेकिन उनमेंसे कुछ, लोगोंकी गरीबी और पीड़ाको देखकर भीतरसे पिघलजातेहैं। वे अपने मूल उद्देश्यको भूलकर बिना किसी धार्मिक एजेंडाके उनकी सेवा-करने लगतेहैं। वे उन सभी कारणोंपर विजय प्राप्त करलेतेहैं जो उन्हें बाँधेहुएथे, और एक स्वयं-निर्धारित निर्णय लेतेहैं।

फिरभी, क्या वह निर्णय लेनेकेलिए उन्हें प्रेरित-करनेवाली चीज़ उनके भीतरकी करुणा नहींथी?

भारतमें "निष्काम योगियों"की परंपराहै। उनमें नतो कोई स्वार्थ होताहै और न कोई धार्मिक एजेंडा। वे करुणासे भी प्रेरित नहीं होते। वे केवल कर्तव्यकी भावनासे कार्य करतेहैं। यही गहरी कर्तव्य-चेतना उनके चुनेहुए मार्गका कारण बनतीहै।

इस प्रकार, इन सभी उदाहरणोंमें, ऊपरसे दिखाई-देनेवाली स्वतंत्र पसंदके पीछे हमेशा कोईनकोई कारण मौजूद रहताहै। क्या आप किसी ऐसे व्यक्तिकी कल्पना करसकतेहैं जो बिना किसी कारणके कुछ करे? शायद यह संभव नहींहै।

लेकिन यहाँ एक सूक्ष्म बातहै जिसपर शायद आपने ध्यान नहीं दिया।

पंखेके मामलेमें कारण भौतिकथा। पशुओंके मामलेमें वह रासायनिकथा। सामान्य मनुष्योंमें वह सामाजिक नियम और स्वीकृत मूल्यहैं। आध्यात्मिक मार्गपर चलनेवालोंकेलिए वह उनकी दृढ़ आस्था है। समाजसेवकोंमें वह करुणा है। और कर्मयोगियोंमें वह गहरी कर्तव्य-भावना है।

इन सभीको किसीनकिसी कारणने प्रेरित किया। लेकिन हम देखसकतेहैं कि यह कारण धीरे-धीरे स्थूलसे सूक्ष्मकी ओर बढ़ताजाताहै।

दूसरे शब्दोंमें कहेंतो, इन सबकेद्वारा प्रदर्शित स्वतंत्र इच्छा एक जैसी नहींथी। उस इच्छाके पीछेका कारण अलग-अलग स्तरोंपर था। ऐसा लगताहै कि वे धीरे-धीरे पूर्ण स्वतंत्र इच्छाकी अंतिम सीमाके निकट पहुँचतेजारहेहैं, भलेही कोईभी वास्तवमें उस सीमातक न पहुँचपाए।

इसलिए, स्वतंत्र इच्छा "है या नहींहै" जैसी कोई बाइनरी चीज़ नहींहै। यह स्वतंत्रताका एक विशाल स्पेक्ट्रम है। इस स्पेक्ट्रमके निम्न स्तरपर रहनेवालोंकी स्वतंत्र इच्छा, उच्च स्तरपर रहनेवालोंकी तुलनामें अधिक सीमित होतीहै। फिरभी, वे सभी विभिन्न स्तरोंपर स्वतंत्र इच्छा प्रदर्शित करतेहैं।

हाँ, यदि इस प्रकार देखा जाए, तो हममेंसे किसीकेपास भी पूर्ण "स्वतंत्र इच्छा" नहींहै। क्योंकि हम सभी कार्य-कारण संबंध के ढाँचेके भीतरही कार्य करतेहैं। उस ढाँचेके भीतर हम सभीकेपास सीमित सीमामें स्वतंत्र इच्छा अवश्यहै। केवल उसका स्तर अलग-अलगहै।

यदि इस "स्वतंत्र इच्छा"के स्पेक्ट्रमकी कोई अंतिम सीमाहो, तो वह कैसी होगी? उस सीमापर स्थित अस्तित्वको कार्य-कारण संबंधसे मुक्त होना चाहिए। वह बिना किसी कारणके कार्य करेगा। वह अनियंत्रित "स्वतंत्र इच्छा" प्रदर्शित करेगा।

भारतीय दर्शन ऐसी एक संभावनाकी कल्पना करताहै। उपनिषद इसे "आत्मा" कहतेहैं — जो कार्य-कारणके बंधनसे मुक्तहै। केवल उसीकेपास पूर्ण "स्वतंत्र इच्छा" होसकतीहै।

सामान्य भाषामें धार्मिक लोग उसे "ईश्वर" कहतेहैं। बाइबिल में ईश्वर बिना किसी कारणके कहताहै — "प्रकाश हो", और प्रकाश होजाताहै। वही सत्ता उपनिषदोंमें कहतीहै — "मैं अनेक होजाऊँ", और वही जगत, जीव-जंतु आदिके रूपमें अनेक होजातीहै।

यदि ऐसा कोई अस्तित्वहै, तो केवल वही पूर्ण स्वतंत्र इच्छासे परिपूर्ण होसकताहै। बाकी सबकी स्वतंत्र इच्छा सीमितहै। जैसे-जैसे हम विकसित होतेहैं, इस स्वतंत्रताकी सीमा केवल विस्तृत होतीजातीहै।

उस स्वतंत्र इच्छाको कुछ साधारण प्रोब्सके माध्यमसे सिद्ध नहीं कियाजासकताहै। उसे केवल अंतर्दृष्टिके माध्यमसे ही जानाजासकताहै।
 
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