पिछले कुछ एपिसोडों में हमने चेतना के बारे में चर्चा की। हमने चेतना की चार अवस्थाओं—जाग्रत अवस्था, स्वप्न अवस्था, सुषुप्ति अवस्था और तुरीय की अवर्णनीय अवस्था—के बारे में बात की। सभी जीवधारी अलग-अलग समय पर इन चार अवस्थाओं में से किसी-न-किसी एक का अनुभव करते हैं।
हमारी यह चर्चा भारत के प्राचीन उपनिषदों में से एक, माण्डूक्य उपनिषद, पर आधारित थी।
पिछले एपिसोड के अंत में मैंने संकेत दिया था कि भारत के अनेक अद्वैत दार्शनिक इन चेतना-अवस्थाओं के बारे में एक भिन्न दृष्टिकोण रखते हैं। इस एपिसोड में मैं गौड़पाद द्वारा अपनी प्रसिद्ध माण्डूक्य कारिका—अर्थात् माण्डूक्य उपनिषद पर लिखी गई उनकी व्याख्या—में प्रस्तुत वैकल्पिक दृष्टिकोण का संक्षेप में वर्णन करूँगा।
गौड़पाद कौन थे?
गौड़पाद अद्वैत परंपरा के मूल दार्शनिक थे। उनका समय छठी शताब्दी ईस्वी का माना जाता है। वे प्रसिद्ध अद्वैत दार्शनिक शंकराचार्य के परमगुरु (गुरु के गुरु) थे।
गौड़पाद ने क्या कहा?
हमारी यह चर्चा भारत के प्राचीन उपनिषदों में से एक, माण्डूक्य उपनिषद, पर आधारित थी।
पिछले एपिसोड के अंत में मैंने संकेत दिया था कि भारत के अनेक अद्वैत दार्शनिक इन चेतना-अवस्थाओं के बारे में एक भिन्न दृष्टिकोण रखते हैं। इस एपिसोड में मैं गौड़पाद द्वारा अपनी प्रसिद्ध माण्डूक्य कारिका—अर्थात् माण्डूक्य उपनिषद पर लिखी गई उनकी व्याख्या—में प्रस्तुत वैकल्पिक दृष्टिकोण का संक्षेप में वर्णन करूँगा।
गौड़पाद कौन थे?
गौड़पाद अद्वैत परंपरा के मूल दार्शनिक थे। उनका समय छठी शताब्दी ईस्वी का माना जाता है। वे प्रसिद्ध अद्वैत दार्शनिक शंकराचार्य के परमगुरु (गुरु के गुरु) थे।
गौड़पाद ने क्या कहा?
गौड़पाद के अनुसार, माण्डूक्य उपनिषद में वर्णित चेतना की पहली तीन अवस्थाएँ केवल आभास हैं; वे वास्तविक नहीं हैं। वास्तविक अवस्था केवल तुरीय है, और वही अकेली अन्य तीन अवस्थाओं के रूप में प्रकट होती है।
यह समझानेकेलिए कि चेतना की एकमात्र अवस्था अन्य तीन अवस्थाओं के रूप में कैसे दिखाई देती है, गौड़पाद अनेक उपमाएँ देते हैं।
स्वप्न की उपमा:
जब कोई व्यक्ति स्वप्न देखता है, तब वह अनेक लोगों, अनेक स्थानों और अनेक घटनाओंकोदेखताहै। लेकिन वास्तव में वे सभी एक ही मन की रचना होते हैं—अर्थात् स्वप्न देखने वाले के मन की। उसी प्रकार गौड़पाद कहते हैं कि एक ही सार्वभौमिक चेतना अनेक जीवों के अस्तित्व का आभास उत्पन्न करती है, जिनमें से प्रत्येक किसी-न-किसी विशेष चेतना-अवस्था में प्रतीत होता है।
इन जीवों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। वे स्वप्न में दिखाई देने वाले दृश्यों के समान हैं। स्वप्न समाप्त होते ही उसके सभी दृश्य और वस्तुएँ लुप्त हो जाती हैं, क्योंकि उनका वास्तव में कभी अस्तित्व था ही नहीं। वे केवल अस्तित्ववान प्रतीत होते थे। इसी प्रकार वास्तविकता में दिखाई देने वाली यह विविधता भी केवल प्रतीत होती है।
यह समझानेकेलिए कि केवल एक चेतना होते हुए भी यह अनेकता कैसे दिखाई देती है, गौड़पाद एक और उपमा देते हैं।
घड़े की उपमा:
मान लीजिए आपके पास बहुत-से घड़े हैं। प्रत्येक घड़े के भीतर कुछ आकाश (माने खाली जगह) है। उस आकाश का एक निश्चित आकार और कुछ विशेषताएँ हैं। घड़ों के बाहर भी आकाश है। तो क्या इसका अर्थ यह है कि अनेक अलग-अलग आकाश हैं—घड़े के भीतर का आकाश और घड़े के बाहर का आकाश?
नहीं। वास्तव में आकाश केवल एक ही है। अनेकता का आभास घड़ा उत्पन्न करता है। घड़ा एक ही आकाश को अनेक अलग-अलग आकाशों के रूप में प्रकट करता है। वह एक अखंड आकाश को अनेक भागों में विभाजित होने का भ्रम उत्पन्न करता है। उसी प्रकार विभिन्न भौतिक रूप यह भ्रम उत्पन्न करते हैं कि अनेक चेतनाएँ हैं। लेकिन वास्तव में केवल एक ही सार्वभौमिक चेतना है।
इसके बाद गौड़पाद तीसरी उपमा देते हैं।
जलती हुई मशाल की उपमा:
जब आप किसी ऐसे स्थान पर जलती हुई मशाल पकड़ते हैं जहाँ हवा नहीं चल रही होती, तब उसकी लौ अपने-आप स्थिर रूप से जलती रहती है। लेकिन जब हवा चलती है, तो लौ हिलने लगती है। और यही गति लौ को विभिन्न आकार ग्रहण करने जैसी प्रतीत कराती है। कुछ समय बाद ऐसा लगता है मानो स्वयं लौ के अनेक रूप हों। यदि मशाल को गोल-गोल घुमाया जाए, तो वह अग्नि के चक्र जैसी दिखाई देती है।
इनमें से कोई भी आकार वास्तव में लौ में कभी था ही नहीं, और न कभी होगा। जब वायु का प्रवाह या गति होती है, तभी ये आकार केवल दिखाई देते हैं। जैसे ही यह गति रुक जाती है, इन आकारों का आभास भी समाप्त हो जाता है।
उसी प्रकार गौड़पाद कहते हैं कि सार्वभौमिक चेतना में उत्पन्न होने वाले स्पंदनों के कारण संसार की अनेक वस्तुएँ केवल अस्तित्ववान प्रतीत होती हैं। वे चेतना द्वारा उत्पन्न नहीं की गई हैं। बल्कि सार्वभौमिक चेतना के स्पंदनों के कारण वे केवल अस्तित्ववान प्रतीत होती हैं।
और इसी सार्वभौमिक चेतना को उपनिषद तुरीय कहता है। शेष तीन अवस्थाएँ—जाग्रत अवस्था, स्वप्न अवस्था और सुषुप्ति अवस्था—केवल उसी चेतना की अभिव्यक्तियाँ हैं।
इनमें से प्रत्येक उपमा अत्यंत गहन है। गौड़पाद ने इन प्रत्येक अवधारणाओं पर विस्तार से लिखा है। यद्यपि ये उपमाएँ अत्यंत सुसंगत हैं, फिर भी वे अनेक प्रश्न उत्पन्न करती हैं। उनसे कई विरोधाभास सामने आते हैं। मैंने अपने ग्रंथ "Unraveling the Hidden Mysteries of The Vedas Part 2: Amazing Upanishads" में इनकी चर्चा की है। उस पुस्तक में आपको इनका अधिक विस्तृत विवरण मिलेगा, साथ ही इन विरोधाभासों का मेरा समाधान और इन प्रश्नों के मेरे उत्तर भी मिलेंगे।
अब गौड़पाद के एकीकृत चेतना के सिद्धांत पर वापस आते हैं। उनकी व्याख्या से दो बातें स्पष्ट होती हैं:
इस सार्वभौमिक चेतना का साक्षात्कार करनेकेलिए गौड़पाद ध्यान के मार्ग की अनुशंसा करते हैं।
अंत में, मैं गौड़पाद के इन शब्दों के साथ इस चर्चा का समापन करता हूँ—
वे कहते हैं कि जब किसी व्यक्ति का मन—
तब उस व्यक्ति का मन स्वयंको उसी सार्वभौमिक चेतना के साथ एकरूप माननेलगताहै।
अगले एपिसोड में एक और रोचक विषय के साथ फिर से मेरे साथ जुड़िए।
भारत के प्राचीन दार्शनिकों द्वारा प्रस्तुत चेतना के इन गहन विचारों के बारे में अपने विचार मुझे अवश्य बताइए।
यह समझानेकेलिए कि चेतना की एकमात्र अवस्था अन्य तीन अवस्थाओं के रूप में कैसे दिखाई देती है, गौड़पाद अनेक उपमाएँ देते हैं।
स्वप्न की उपमा:
जब कोई व्यक्ति स्वप्न देखता है, तब वह अनेक लोगों, अनेक स्थानों और अनेक घटनाओंकोदेखताहै। लेकिन वास्तव में वे सभी एक ही मन की रचना होते हैं—अर्थात् स्वप्न देखने वाले के मन की। उसी प्रकार गौड़पाद कहते हैं कि एक ही सार्वभौमिक चेतना अनेक जीवों के अस्तित्व का आभास उत्पन्न करती है, जिनमें से प्रत्येक किसी-न-किसी विशेष चेतना-अवस्था में प्रतीत होता है।
इन जीवों का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। वे स्वप्न में दिखाई देने वाले दृश्यों के समान हैं। स्वप्न समाप्त होते ही उसके सभी दृश्य और वस्तुएँ लुप्त हो जाती हैं, क्योंकि उनका वास्तव में कभी अस्तित्व था ही नहीं। वे केवल अस्तित्ववान प्रतीत होते थे। इसी प्रकार वास्तविकता में दिखाई देने वाली यह विविधता भी केवल प्रतीत होती है।
यह समझानेकेलिए कि केवल एक चेतना होते हुए भी यह अनेकता कैसे दिखाई देती है, गौड़पाद एक और उपमा देते हैं।
घड़े की उपमा:
मान लीजिए आपके पास बहुत-से घड़े हैं। प्रत्येक घड़े के भीतर कुछ आकाश (माने खाली जगह) है। उस आकाश का एक निश्चित आकार और कुछ विशेषताएँ हैं। घड़ों के बाहर भी आकाश है। तो क्या इसका अर्थ यह है कि अनेक अलग-अलग आकाश हैं—घड़े के भीतर का आकाश और घड़े के बाहर का आकाश?
नहीं। वास्तव में आकाश केवल एक ही है। अनेकता का आभास घड़ा उत्पन्न करता है। घड़ा एक ही आकाश को अनेक अलग-अलग आकाशों के रूप में प्रकट करता है। वह एक अखंड आकाश को अनेक भागों में विभाजित होने का भ्रम उत्पन्न करता है। उसी प्रकार विभिन्न भौतिक रूप यह भ्रम उत्पन्न करते हैं कि अनेक चेतनाएँ हैं। लेकिन वास्तव में केवल एक ही सार्वभौमिक चेतना है।
इसके बाद गौड़पाद तीसरी उपमा देते हैं।
जलती हुई मशाल की उपमा:
जब आप किसी ऐसे स्थान पर जलती हुई मशाल पकड़ते हैं जहाँ हवा नहीं चल रही होती, तब उसकी लौ अपने-आप स्थिर रूप से जलती रहती है। लेकिन जब हवा चलती है, तो लौ हिलने लगती है। और यही गति लौ को विभिन्न आकार ग्रहण करने जैसी प्रतीत कराती है। कुछ समय बाद ऐसा लगता है मानो स्वयं लौ के अनेक रूप हों। यदि मशाल को गोल-गोल घुमाया जाए, तो वह अग्नि के चक्र जैसी दिखाई देती है।
इनमें से कोई भी आकार वास्तव में लौ में कभी था ही नहीं, और न कभी होगा। जब वायु का प्रवाह या गति होती है, तभी ये आकार केवल दिखाई देते हैं। जैसे ही यह गति रुक जाती है, इन आकारों का आभास भी समाप्त हो जाता है।
उसी प्रकार गौड़पाद कहते हैं कि सार्वभौमिक चेतना में उत्पन्न होने वाले स्पंदनों के कारण संसार की अनेक वस्तुएँ केवल अस्तित्ववान प्रतीत होती हैं। वे चेतना द्वारा उत्पन्न नहीं की गई हैं। बल्कि सार्वभौमिक चेतना के स्पंदनों के कारण वे केवल अस्तित्ववान प्रतीत होती हैं।
और इसी सार्वभौमिक चेतना को उपनिषद तुरीय कहता है। शेष तीन अवस्थाएँ—जाग्रत अवस्था, स्वप्न अवस्था और सुषुप्ति अवस्था—केवल उसी चेतना की अभिव्यक्तियाँ हैं।
इनमें से प्रत्येक उपमा अत्यंत गहन है। गौड़पाद ने इन प्रत्येक अवधारणाओं पर विस्तार से लिखा है। यद्यपि ये उपमाएँ अत्यंत सुसंगत हैं, फिर भी वे अनेक प्रश्न उत्पन्न करती हैं। उनसे कई विरोधाभास सामने आते हैं। मैंने अपने ग्रंथ "Unraveling the Hidden Mysteries of The Vedas Part 2: Amazing Upanishads" में इनकी चर्चा की है। उस पुस्तक में आपको इनका अधिक विस्तृत विवरण मिलेगा, साथ ही इन विरोधाभासों का मेरा समाधान और इन प्रश्नों के मेरे उत्तर भी मिलेंगे।
अब गौड़पाद के एकीकृत चेतना के सिद्धांत पर वापस आते हैं। उनकी व्याख्या से दो बातें स्पष्ट होती हैं:
• यह संसार केवल सार्वभौमिक चेतना में उत्पन्न होने वाले स्पंदनों से प्रकट होने वाला एक आभास है।
• और जब ये स्पंदन रुक जाते हैं, तब इस संसार का आभास भी समाप्त हो जाता है।
• और जब ये स्पंदन रुक जाते हैं, तब इस संसार का आभास भी समाप्त हो जाता है।
इस सार्वभौमिक चेतना का साक्षात्कार करनेकेलिए गौड़पाद ध्यान के मार्ग की अनुशंसा करते हैं।
अंत में, मैं गौड़पाद के इन शब्दों के साथ इस चर्चा का समापन करता हूँ—
"यदा न लीयते चित्तं, न च विक्षिप्यते पुनः।
अनिङ्गनम् अनाभासं निष्पन्नं ब्रह्म तत्तदा॥"
— माण्डूक्य कारिका: अद्वैत प्रकरण, श्लोक 46।
अनिङ्गनम् अनाभासं निष्पन्नं ब्रह्म तत्तदा॥"
— माण्डूक्य कारिका: अद्वैत प्रकरण, श्लोक 46।
वे कहते हैं कि जब किसी व्यक्ति का मन—
• सुषुप्ति में लीन नहीं होताहै, और
• जाग्रत तथा स्वप्न अवस्थाओं में बिखरता नहीं है, और
• किसी शांत, निर्वात स्थान में रखे दीपक की लौ की तरह स्थिर बना रहता है, और
• मिथ्या पहचानों को ग्रहण करना छोड़ देता है,
• जाग्रत तथा स्वप्न अवस्थाओं में बिखरता नहीं है, और
• किसी शांत, निर्वात स्थान में रखे दीपक की लौ की तरह स्थिर बना रहता है, और
• मिथ्या पहचानों को ग्रहण करना छोड़ देता है,
तब उस व्यक्ति का मन स्वयंको उसी सार्वभौमिक चेतना के साथ एकरूप माननेलगताहै।
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© Dr. King, Swami Satyapriya 2026

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