/* */ Let's THINK : By Dr.King, Swami Satyapriya: [Hindi] तुरीय प्रज्ञा का वास्तविक चमत्कार

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Saturday, August 1, 2026

[Hindi] तुरीय प्रज्ञा का वास्तविक चमत्कार

 
 
 
 
पिछले कुछ एपिसोडों में हमने दर्शन की कुछ अत्यंत गहन अवधारणाओं की यात्रा की थी। हमने चर्चा की थी कि प्राचीन भारतीय ऋषि प्रज्ञा के बारे में क्या दृष्टिकोण रखते थे। उस चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण भाग था प्रज्ञा की वह आश्चर्यजनक और मन को विस्मित कर देने वाली अवस्था, जिसे तुरीय कहा जाता है और जो अनुभव-आधारित समस्त तर्क से परे प्रतीत होती है।

आधुनिक और तर्कप्रधान मन के लिए तुरीय की यह अवधारणा एक सुंदर कल्पना जैसी लग सकती है। यह एक काव्यमय, आदर्शवादी और अवास्तविक विचार भी प्रतीत हो सकती है। इसलिए कोई संशयवादी पूछ सकता है, "क्या वास्तवमें कोई इस अवस्था में जीया था? या यह केवल प्राचीन मनोविज्ञान की एक काल्पनिक कहानी है?"

आज मैं आपके सामने यह तर्क रखना चाहता हूँ कि तुरीय की यह अवस्था केवल कल्पना नहीं है। संभव है कि हम इसे वैज्ञानिक रूपसे सिद्ध न करसकें। लेकिन हम उन लोगों के जीवन की प्रामाणिक घटनाओं का अध्ययन अवश्य करसकतेहैं, जिन्होंने इस अवस्था में जीवन बिताया। ऐसे लोग जो सदियों पहले नहीं, बल्कि कुछ ही दशक पहले हमारे बीच रहे। और जिनके जीवन की घटनाएँ बिना किसी अतिशयोक्ति या महिमामंडन के दर्ज की गई हैं।
 
इसी उद्देश्य से मैं दक्षिण भारत के एक प्रसिद्ध संत के जीवन का उदाहरण लेना चाहता हूँ। मैं यहाँ किसी पुस्तक या स्तुतिगान का सहारा नहीं ले रहा हूँ। मेरा आधार केवल उन साधारण लोगों के अनुभव हैं, जिन्होंने उनके साथ जीवन बिताया और उन्हें अपनी आँखों से देखा। उन लोगों का कोई स्वार्थ नहीं था और न ही झूठ बोलने का कोई कारण।

सबसे पहले यह जानकारी मुझे कुछ वृद्ध महिलाओं से मिली, जो उस संत के जीवनकाल में जीवित थीं। वे नहीं जानती थीं कि वे कौन थे। उन्हें यह भी पता नहीं था कि वे कहाँ से आए थे। वह संत दक्षिण भारत के तटीय गाँवों में पूर्णतः दिगम्बर होकर विचरण करते थे।

वे लगभग किसी से बात नहीं करते थे, इसलिए उपदेश देने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। उन्होंने कभी किसी से भोजन भी नहीं माँगा। कभी-कभी लोग उन्हें कूड़ेदान में फेंका हुआ भोजन खाते हुए देखते थे। इसलिए लगभग सभी लोग उन्हें पागल समझते थे।

गली के बच्चे उनका मज़ाक उड़ाते थे। यहाँ तक कि उन पर पत्थर भी फेंकते थे। लेकिन वे कभी प्रतिक्रिया नहीं देते थे। कभी-कभी उन शरारती बच्चों से बचने के लिए वे ऊँचे पेड़ों पर चढ़कर बैठ जाते थे।

इस प्रकार वर्षों तक गाँव-गाँव भटकने के बाद वे अंततः आज के महानगर मुंबई के निकट एक जंगल में स्थित एक जीर्ण-शीर्ण मंदिर में रहने लगे। वहाँ के आदिवासी उनकी देखभाल करने लगे और उन्होंने उनके लिए एक छोटी-सी कुटिया भी बना दी।

वे अपना अधिकांश समय उसी कुटिया में ध्यानमग्न बैठे हुए बिताते थे, मानो उन्हें बाहरी संसार का कोई बोध ही न हो। बहुत कम अवसरों पर ही वे किसी से बात करते थे।

लेकिन धीरे-धीरे लोग उनकी ओर आकर्षित होने लगे। उनकी ख्याति फैलने लगी। लोग उन्हें भगवान और दिव्य पुरुष कहने लगे। इस प्रकार गणेशपुरी के भगवान नित्यानन्द के रूप में वे प्रसिद्ध हुए।

उसी समय कृष्ण नाम का एक युवा ब्राह्मण लड़का अपना गाँव छोड़कर वहाँ आ पहुँचा। वह इस झूठे आरोप से बचने के लिए भाग आया था कि उसने अपने गाँव के धनी व्यक्ति के मंदिर में स्थापित देवता के आभूषण चुरा लिए थे।

उसे भगवान नित्यानन्द के आश्रम में शरण मिली।

लेकिन कृष्ण के मन में नित्यानन्द के प्रति तनिक भी सम्मान नहीं था। वास्तवमें, जब वर्षों पहले नित्यानन्द दिगम्बर होकर उसके गाँव में घूमते थे, तब सम्भव है कि उन पर पत्थर फेंकने वाले शरारती लड़कों में कृष्ण भी शामिल रहा हो। लेकिन अब वह असहाय था। उसके पास जाने के लिए कोई दूसरा स्थान नहीं था। उसे केवल उन लोगों से बचने के लिए एक सुरक्षित आश्रय चाहिए था जो उसकी तलाश कर रहे थे।

कई दशक बाद मेरी भेंट उसी कृष्ण से हुई। तब तक वे मुझसे काफी बड़े हो चुके थे। वे मंदिर के पुजारी बन चुके थे—कृष्ण आचार्य। उन्होंने मुझे नित्यानन्द के जीवन की अनेक रोचक घटनाएँ सुनाईं।

बचपन में कृष्ण को लगता था कि नित्यानन्द एक पागल के अलावा कुछ भी नहीं हैं। जब भी वे आदिवासियों को उन्हें भगवान कहते सुनते, तो हँस पड़ते थे। लेकिन जिज्ञासावश उन्होंने इस "पागल" की हर गतिविधि पर ध्यान देना शुरू किया।

कृष्ण आचार्य के अनुसार नित्यानन्द लगभग हर समय गहरे समाधि जैसे अवस्था में रहते थे। वे केवल बहुत ही दुर्लभ अवसरों पर बोलते थे।

लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि वे केवल तब पागलों जैसा व्यवहार करते थे, जब जुआरी अपनी बाज़ियों के बारे में सलाह लेने आते थे। वे उन पर चिल्लाते, उन्हें डाँटते और जो भी वस्तु हाथ लगती, उसे उनकी ओर फेंककर उन्हें भगाने की कोशिश करते। लेकिन कोई भी इसे गंभीरता से नहीं लेता था। लोग उनके प्रत्येक शब्द और उनकी प्रत्येक उँगली की हरकत को जीतने वाले अंकों का संकेत मानते थे।

इस "पागल" की दिनचर्या कैसी थी?

आख़िर एक पागल को भी भोजन करना पड़ता है। उसे भी प्रकृति की पुकार का उत्तर देना पड़ता है। क्या नित्यानन्द इसके अपवाद थे?

कृष्ण इन सब बातों का अत्यंत ध्यानपूर्वक निरीक्षण करते थे।

कृष्ण के अनुसार नित्यानन्द प्रातः बहुत जल्दी उठते और अपनी कुटिया से बाहर निकलते। प्रकृति की पुकार पूरी करने के बाद वे पास के तालाब में गर्दन तक पानी में खड़े रहते। ऐसा भी नहीं लगता था कि वे अपने शरीर को ठीक से साफ़ करने का कोई प्रयास कर रहे हों।

एक बात ने कृष्ण को विशेष रूपसे प्रभावित किया। चाहे उठना हो, चलना हो, तालाब में स्नान करना हो, वापस कुटिया में लौटना हो या कोई भी अन्य कार्य—नित्यानन्द सबकुछ ऐसे करते थे जैसे कोई नींद में चल रहा हो। उनमें किसी भी प्रकार का व्यक्तिगत आग्रह दिखाई नहीं देता था। सबकुछ पूर्ण शांति और लगभग यांत्रिक सटीकता के साथ होता था। ऐसा लगता था मानो उनका शरीर अपने-आप कार्य कर रहा हो, जबकि उनकी प्रज्ञा कहीं और स्थित हो।

जब गाँव वाले उनके सामने भोजन रख देते, तो वे कभी-कभी जो सामने होता वही खा लेते। यहाँ तक कि फलों को बिना छीले ही खा लेते थे। स्वाद, पसंद-नापसंद या सामाजिक शिष्टाचार—इनमें से किसी भी बात की उन्हें कोई परवाह नहीं थी। ऐसा प्रतीत होता था मानो उनमें "मैं" कहने वाला, किसी वस्तु को पसंद या नापसंद करने वाला व्यक्तिगत अहंकार ही शेष न रहा हो।

यह सब देखकर कृष्ण पूरी तरह उलझ गए।

"क्या यह व्यक्ति सचमुच पागल है?"

वे बार-बार स्वयं से यही प्रश्न पूछते रहे।

समय बीतता गया.

अब तक कृष्ण वहाँ के जीवन में पूरी तरह रच-बस चुके थे। वे सड़क के किनारे हिंदू देवी-देवताओं के चित्र रखकर बैठते थे। गाँव के लोग उन्हें विशेष पूजाएँ करवाने के लिए पैसे देते थे। इसी प्रकार उनका जीवन चल रहा था।

लेकिन एक दिन कृष्ण एक स्थानीय गुंडे द्वारा किए गए अपराध के प्रत्यक्षदर्शी बन गए।

आख़िरकार पुलिस ने उस अपराधी को गिरफ्तार करलिया और कृष्ण को न्यायालय में गवाही देने के लिए बुलाया गया।

अब कृष्ण बहुत बड़ी कठिनाई में पड़ गए।

यदि वे न्यायालय जाते, तो उस गुंडे के लोग उनकी हत्या करसकतेथे।

यदि वे नहीं जाते, तो पुलिस उन्हें बलपूर्वक वहाँ लेजाती।

उन्हें समझमें नहीं आ रहा था कि क्या करें।

अंततः आँखों में आँसू भरकर उन्होंने नित्यानन्द के सामने अपनी पूरी परिस्थिति बताई। कृष्ण स्वयं कभी एक भगोड़े के रूपमें वहाँ पहुँचे थे। वहाँ उनका कोई अपना नहीं था। और उन्हें यह आशा भी नहीं थी कि सदैव समाधि में लीन रहने वाले नित्यानन्द उनकी सहायता करेंगे।

लेकिन आश्चर्य की बात यह हुई कि नित्यानन्द ने उनकी सहायता की।

उन्होंने कुछ क्षणों के लिए अपनी आँखें खोलीं और मानो नींद में बोल रहे हों, ऐसे कुछ शब्द कहे।

"अरे मूर्ख! अपने गाँव लौट जा। कोई भी तेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। तेरे गाँव के लोग तुझे खोज रहे हैं। वे बहुत जल्द यहाँ पहुँचने वाले हैं।"

यह सुनकर कृष्ण और भी अधिक चिंतित हो गए।

उन्हें विश्वास था कि उनके गाँव से इतनी दूर इस जंगल में कोई उन्हें कभी खोज नहीं पाएगा। लेकिन यदि इस "पागल" की बात सच थी, तो इसका अर्थ था कि न केवल उन्होंने उन्हें खोज लिया था, बल्कि वे उन्हें वापस ले जाने के लिए रास्ते में भी थे।

शायद उस रात कृष्ण को बिल्कुल भी नींद नहीं आई।

अगले दिन ठीक वैसा ही हुआ जैसा नित्यानन्द ने कहा था। कृष्ण के गाँव का एक व्यक्ति उन्हें खोजता हुआ वहाँ पहुँचा।

वह अपने साथ एक सुखद समाचार लेकर आया।

अब गाँव के लोगों को पता चल चुका था कि कृष्ण निर्दोष हैं।

और एक दूसरी अच्छी खबर भी थी।

वे चाहते थे कि कृष्ण ही उनके नव-जीर्णोद्धारित मंदिर के पुजारी बनें!

कृष्ण ने नित्यानन्द के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त की।

वे उनके चरणों में गिर पड़े और उन्हें गलत समझने के लिए क्षमा माँगी।

बहुत वर्षों बाद जब मैं उसी कृष्ण से उनके गाँव के मंदिर में पुजारी के रूपमें मिला, तब वे मुझे नित्यानन्द के साथ अपने अनुभव सुना रहे थे। बोलते समय उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

वे पूरी तरह बदल चुके थे।

उनके मन में नित्यानन्द के प्रति गहरी श्रद्धा उत्पन्न हो चुकी थी।

इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी संकल्प किया था कि वे भी अपने गुरु की तरह ईमानदार, निस्वार्थ और पूर्णतः अनासक्त जीवन जीएँगे।

अपने पूरे जीवनभर कृष्ण आचार्य ने अत्यंत ईमानदार और सरल जीवन जिया।

उन्होंने अनेक ऐसे निर्धन लड़कों की भी सहायता की, जो उनकी ही तरह घर छोड़कर भाग आए थे और छोटे-मोटे काम करके अपना जीवन चला रहे थे।

आज यदि आप YouTube पर खोजेंगे, तो आपको भगवान नित्यानन्द के चमत्कारों और अलौकिक शक्तियों के बारे में असंख्य वीडियो मिल जाएँगे।

लेकिन वही वास्तविक चमत्कार नहीं है।

वास्तविक चमत्कार तो यह है कि ऐसे महात्मा अपने संपर्क में आने वाले लोगों का जीवन किस प्रकार बदल देते हैं।

बिना कुछ कहे…

बिना कोई उपदेश दिए…

बिना किसी प्रकार का जादू किए।

क्या यह सब इस बात का पर्याप्त संकेत नहीं है कि जिस अवस्था में वे जी रहे थे, वह केवल कोई मनोवैज्ञानिक स्थिति नहीं थी, या फिर प्रसिद्ध अमेरिकी तंत्रिका-विज्ञानी वी. एस. रामचन्द्रन द्वारा प्रस्तावित तथाकथित "टेम्पोरल लोब एपिलेप्सी" मात्र नहीं थी?

शायद हमें अपना मन इतना खुला रखना चाहिए कि हम इससे भी बेहतर व्याख्याओं की खोज करसकें।

आपकी दृष्टि में नित्यानन्द वास्तवमें कौन थे? एक पागल? या वह सच्चे योगी जिन्होंने प्रज्ञा की सर्वोच्च अवस्था प्राप्त करलीथी? आप क्या सोचते हैं? अपनी राय हमें अवश्य बताइए।

अगले एपिसोड में फिर मुलाक़ात होगी।
 
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